आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने लंदन में 'एकता का जश्न' कार्यक्रम के दौरान हिंदुत्व की परिभाषा स्पष्ट करते हुए कहा कि इसका मूल आधार नफरत नहीं, बल्कि सात्त्विक प्रेम और सामाजिक जुड़ाव है। उन्होंने विविधता में एकता और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर भी जोर दिया।
- हिंदुत्व का मूल आधार नफरत नहीं, बल्कि 'सात्त्विक प्रेम' और अपनापन है।
- हिंदू विचारधारा में परिवार, समाज, मानवता और प्रकृति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
- भारत की प्रगति का उद्देश्य पूरी दुनिया की शांति और समृद्धि होना चाहिए।
- ब्रिटेन में रहने वाले हिंदुओं को अपनी कर्मभूमि के प्रति वफादार रहने की सलाह दी गई।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत वर्तमान में ब्रिटेन दौरे पर हैं। रविवार को लंदन में आयोजित 'एकता का जश्न' (Celebration of Oneness) नामक एक विशेष कार्यक्रम में भागवत ने हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, सेवा और समाज के भविष्य पर अपने गहन विचार साझा किए। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ की कार्यप्रणाली का मूल मंत्र नफरत फैलाना नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग को अपने साथ जोड़ना है।
सात्त्विक प्रेम और सामाजिक एकता
अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि यदि संघ के सिद्धांतों को एक शब्द में परिभाषित करना हो, तो वह है 'अपनापन'। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी सोच है जो शुद्ध सात्त्विक प्रेम पर आधारित है। हिंदू विचार में व्यक्ति का अस्तित्व उसके परिवार, समाज, मानवता और प्रकृति से अलग नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि एक हिंदू केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह प्रकृति के प्रति भी गहरा सम्मान और प्रेम रखता है।
हिंदुत्व का अर्थ प्रकृति पर विजय पाना नहीं, बल्कि प्रकृति का हिस्सा बनकर उसके साथ सामंजस्य बिठाना है।
राष्ट्र बनाम नेशन: एक वैचारिक अंतर
हिंदू राष्ट्र के विषय पर चर्चा करते हुए भागवत ने 'राष्ट्र' और आधुनिक 'नेशन' के बीच एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि जहाँ 'नेशन' अक्सर एक राजनीतिक व्यवस्था या राज्य की सीमाओं तक सीमित होता है, वहीं 'राष्ट्र' एक साझा चेतना और उच्च उद्देश्य से संचालित होता है। उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास विभिन्न शासन व्यवस्थाओं और विदेशी शासनों के बावजूद अपनी सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना को बनाए रखने में सफल रहा है, जो इसकी सांस्कृतिक शक्ति का प्रमाण है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि मोहन भागवत का यह वैश्विक दौरा न केवल प्रवासी भारतीयों के बीच संघ की विचारधारा को सुदृढ़ करने का प्रयास है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिंदुत्व की एक सकारात्मक और समावेशी छवि प्रस्तुत करने की रणनीति भी है। उनका संदेश विविधता को स्वीकार करने और उसे एकता के आभूषण के रूप में देखने का है।
प्रवासी भारतीयों के लिए संदेश
लंदन में मौजूद हिंदू समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने 'कर्मभूमि' के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन में रहने वाले हिंदुओं को वहां की व्यवस्था और समाज के प्रति वफादार रहना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत से भावनात्मक जुड़ाव रखने और अपनी वर्तमान कर्मभूमि (ब्रिटेन) के प्रति निष्ठावान रहने में कोई विरोधाभास नहीं है। उन्होंने 'थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली' के सिद्धांत का समर्थन किया।
सेवा और युवा पीढ़ी का भविष्य
भागवत ने 'सेवा' को अहंकार के बजाय सौभाग्य माना। उनके अनुसार, वास्तविक सेवा वह है जो प्राप्तकर्ता को इतना सशक्त बना दे कि वह स्वयं दूसरों की मदद करने के योग्य बन सके। अंत में, उन्होंने युवाओं पर अपना अटूट विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि नई पीढ़ी के पास दुनिया को बेहतर बनाने का उत्साह है। उन्होंने सुझाव दिया कि समाज को युवाओं पर अपने तरीके थोपने के बजाय उन्हें केवल उद्देश्य देना चाहिए और उन्हें अपना रास्ता स्वयं खोजने की स्वतंत्रता देनी चाहिए।
Frequently Asked Questions
1. मोहन भागवत के अनुसार हिंदुत्व क्या है?
भागवत के अनुसार, हिंदुत्व एक जीवन पद्धति और सोच है जो सात्त्विक प्रेम, मानवता और प्रकृति के साथ जुड़ाव पर आधारित है।
2. उन्होंने प्रवासी भारतीयों को क्या सलाह दी?
उन्होंने सलाह दी कि प्रवासी भारतीय अपनी कर्मभूमि (जैसे ब्रिटेन) के प्रति ईमानदार रहें और वहीं रहकर वैश्विक स्तर पर योगदान दें।