आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने लंदन में एक संवाद कार्यक्रम के दौरान कहा कि हिंदू विचारधारा और संघ के कार्यों का मूल आधार 'अपनत्व' और प्रेम है, न कि नफरत।
- मोहन भागवत ने लंदन में हिंदू दर्शन और 'अपनत्व' पर जोर दिया।
- उन्होंने स्पष्ट किया कि आरएसएस का कार्य घृणा पर नहीं, बल्कि प्रेम पर आधारित है।
- एकता के लिए सामाजिक जुड़ाव और अपनेपन की भावना को आवश्यक बताया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में लंदन में आयोजित एक महत्वपूर्ण संवाद कार्यक्रम को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने वैश्विक मंच से भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और संघ की कार्यप्रणाली पर गहराई से प्रकाश डाला। भागवत ने जोर देकर कहा कि आरएसएस का संपूर्ण कार्य 'अपनत्व' की भावना पर टिका है, जो हिंदू विचार का एक अभिन्न अंग है।
अपने संबोधन में भागवत ने स्पष्ट किया कि समाज को जोड़ने के लिए घृणा का कोई स्थान नहीं है। उन्होंने कहा कि 'अपनत्व' या एक होने का भाव ही वह सूत्र है जो विविधतापूर्ण समाज को एकता के सूत्र में पिरोता है। उनके अनुसार, हिंदू धर्म का मूल दर्शन प्रेम और समावेशिता है, जो समाज के हर वर्ग को एक साथ लाने का प्रयास करता है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि मोहन भागवत का यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आरएसएस की छवि को एक सकारात्मक और सामाजिक कल्याणकारी संगठन के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है। लंदन जैसे वैश्विक केंद्र में यह संदेश देना कि संघ का आधार 'प्रेम' है, वैश्विक विमर्श में भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूती प्रदान करता है।
'अपनत्व' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वह शक्ति है जो समाज के बिखराव को रोककर उसे अखंड बना सकती है।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो, आरएसएस ने हमेशा से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वकालत की है। भागवत का यह बयान उस वैचारिक ढांचे को और स्पष्ट करता है, जहाँ राष्ट्रवाद को नफरत के बजाय सामाजिक सामंजस्य के माध्यम से प्राप्त करने की बात कही गई है। उन्होंने वैश्विक भारतीयों (Diaspora) से भी अपील की कि वे अपनी जड़ों से जुड़े रहें और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रसार करें।
Frequently Asked Questions
1. मोहन भागवत ने लंदन में मुख्य रूप से किस विषय पर बात की?
उन्होंने हिंदू दर्शन, 'अपनत्व' की भावना और आरएसएस के सामाजिक कार्यों के मूल सिद्धांतों पर चर्चा की।
2. 'अपनत्व' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है एक होने का अहसास और दूसरों के प्रति अपनत्व या अपनेपन की भावना रखना।