कब्जे वाले वेस्ट बैंक के मसाफर यट्टा में इजरायली सेना ने रिहायशी घरों और स्कूलों को निशाना बनाया है। मलबे के बीच भी बच्चों ने शिक्षा जारी रखने का संकल्प लिया है।
- इजरायली सेना ने खिरबेट अल-फखित में घरों, सौर ऊर्जा संयंत्रों और जल बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दिया।
- शाब अल-बुतुम स्कूल और ज़िफ सेकेंडरी स्कूल फॉर गर्ल्स पर विध्वंस का खतरा मंडरा रहा है।
- इजरायल ने बिना परमिट के निर्माण का हवाला दिया, जबकि यूएन का कहना है कि फिलिस्तीनियों को परमिट मिलना असंभव है।
- मसाफर यट्टा के बड़े हिस्सों को 'सैन्य फायरिंग ज़ोन' घोषित कर विस्थापन की कोशिश की जा रही है।
कब्जे वाले वेस्ट बैंक में हेब्रोन के दक्षिण में स्थित मसाफर यट्टा के निवासियों के लिए जीवन एक दुःस्वप्न बन गया है। इजरायली सेना ने रिहायशी इलाकों और शिक्षा केंद्रों को निशाना बनाते हुए व्यापक स्तर पर विध्वंस अभियान चलाया है। इस त्रासदी का सबसे दर्दनाक चेहरा 12 वर्षीय सुंदस अल-हमामदेह के रूप में सामने आया, जो स्कूल से वापस लौटी तो पाया कि उसका घर पूरी तरह मलबे में तब्दील हो चुका है।
खिरबेट अल-फखित में चलाया गया यह अभियान केवल घरों तक सीमित नहीं था; सेना ने पशु आश्रयों, पानी की टंकियों और सौर ऊर्जा प्रणालियों को भी नष्ट कर दिया। यह क्षेत्र 'एरिया सी' (Area C) के अंतर्गत आता है, जहाँ योजना और निर्माण पर इजरायल का पूर्ण नियंत्रण है। इजरायली अधिकारियों का दावा है कि ये निर्माण बिना अनुमति के किए गए थे, जबकि संयुक्त राष्ट्र का तर्क है कि फिलिस्तीनियों के लिए ऐसी अनुमति प्राप्त करना लगभग नामुमकिन है।
शिक्षा केंद्रों पर हमला इस रणनीति का मुख्य हिस्सा है। 4 अगस्त को, इजरायली बुलडोजरों ने शाब अल-बुतुम स्कूल के कई कमरों को ध्वस्त कर दिया। यह स्कूल किंडरगार्टन से 11वीं कक्षा तक के लगभग 60 छात्रों को शिक्षा देता है। स्कूल की दूरस्थ स्थिति के कारण छात्रों के लिए किसी अन्य संस्थान में जाना अत्यंत कठिन है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि स्कूलों को निशाना बनाना जबरन विस्थापन की एक सोची-समझी रणनीति है। जब बच्चों के पास पढ़ने के लिए सुरक्षित स्थान नहीं बचता, तो परिवार वहां रहने के लिए मजबूर नहीं रह पाते। इससे इजरायल के लिए इस क्षेत्र को सैन्य फायरिंग ज़ोन में बदलना और बस्तियों का विस्तार करना आसान हो जाता है।
"स्कूलों का विध्वंस सीधे तौर पर शिक्षा के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है, जो कक्षाओं को मनोवैज्ञानिक युद्ध के मैदान में बदल देता है।"
स्थिति और भी गंभीर है क्योंकि छात्रों को चेकपोस्ट और कट्टरपंथी बसने वालों (settlers) के उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। ज़िफ सेकेंडरी स्कूल फॉर गर्ल्स, जहाँ 250 छात्राएं पढ़ती हैं, को 2016 से विध्वंस का नोटिस मिला हुआ है। प्रधानाध्यापिका हना अल-सलामीन के अनुसार, इस अनिश्चितता ने छात्राओं में भारी मानसिक तनाव और डर पैदा कर दिया है।
इन तमाम मुश्किलों के बावजूद, बच्चों का जज्बा कम नहीं हुआ है। 10वीं कक्षा की छात्रा रबीहा यूसुफ जिब्रिल ने साहस दिखाते हुए कहा कि यदि स्कूल की इमारतें गिरा दी गईं, तो भी वे पेड़ों के नीचे बैठकर पढ़ाई जारी रखेंगी। उनका मानना है कि किताबों को जब्त किया जा सकता है, लेकिन उनके दिमाग और दिल में बसी शिक्षा को कोई नहीं छीन सकता।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
इजरायल इन ढांचों को क्यों गिरा रहा है?
इजरायल का आधिकारिक तर्क है कि ये इमारतें बिना वैध परमिट के बनाई गई थीं। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन इसे विस्थापन की रणनीति मानते हैं।
मसाफर यट्टा के बच्चों पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है?
बच्चे न केवल अपना घर और स्कूल खो रहे हैं, बल्कि वे गंभीर मानसिक आघात, असुरक्षा और शिक्षा में आने वाली बाधाओं से जूझ रहे हैं।