ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान रूस और ईरान ने अमेरिकी आधिपत्य और पश्चिमी प्रतिबंधों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। इस तीखे रुख ने मेजबान भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है, जिसे अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने मजबूत संबंधों को संतुलित करना है।
- ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में रूस और ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों और वैश्विक आधिपत्य की कड़े शब्दों में निंदा की।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ द्विपक्षीय वार्ता की।
- भारत के सामने पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए ब्रिक्स भागीदारों के साथ संतुलन बनाने की बड़ी चुनौती है।
हाल ही में आयोजित ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन वैश्विक राजनीति का एक नया अखाड़ा बन गया है, जहां रूस और ईरान ने खुलकर अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगियों पर निशाना साधा है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि उनका देश अमेरिकी 'अहंकार' और एकतरफा प्रतिबंधों के सामने कभी आत्मसमर्पण नहीं करेगा। वहीं, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी वैश्विक मंच पर डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए ब्रिक्स देशों को एकजुट होने का आह्वान किया। इस तीखी बयानबाजी के बीच, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक भूमिका बेहद संवेदनशील हो गई है।
शिखर सम्मेलन के इतर, पीएम मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन को गले लगाया और ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान का गर्मजोशी से हाथ थामा। इन मुलाकातों ने वैश्विक मीडिया का ध्यान आकर्षित किया है, खासकर ऐसे समय में जब अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान पर दबाव बढ़ा दिया है और डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ कड़े बयान दिए हैं। भारत के लिए यह स्थिति एक दोधारी तलवार की तरह है, जहां उसे अपने पुराने दोस्तों (रूस और ईरान) और नए रणनीतिक साझेदार (अमेरिका) के बीच संतुलन साधना है।
भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन की बड़ी चुनौती
भारत हमेशा से 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति पर चलता रहा है। हालांकि, ब्रिक्स का नया विस्तारित रूप, जिसमें ईरान, सऊदी अरब, मिस्र, इथियोपिया और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हो चुके हैं, इसे तेजी से एक पश्चिम-विरोधी ब्लॉक के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। रूस और ईरान इस मंच का उपयोग अमेरिकी प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने के लिए कर रहे हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह इस मंच का हिस्सा रहते हुए भी खुद को पश्चिमी देशों की नजरों में एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में पेश करे।
इसके अलावा, ईरान के साथ भारत के संबंध बेहद महत्वपूर्ण हैं, विशेषकर चाबहार बंदरगाह के विकास को लेकर, जो भारत को मध्य एशिया और यूरोप तक बाईपास मार्ग प्रदान करता है। लेकिन अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए कड़े प्रतिबंध भारत के इन रणनीतिक निवेशों के लिए लगातार मुश्किलें खड़ी करते रहे हैं।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि ब्रिक्स का यह नया ध्रुवीकरण भारत की वैश्विक कूटनीति की सबसे बड़ी परीक्षा है। यदि भारत रूस और ईरान के करीब जाता है, तो वाशिंगटन के साथ उसके संबंधों (जैसे क्वाड और इंडो-पैसिफिक साझेदारी) पर असर पड़ सकता है। इसके विपरीत, यदि भारत पश्चिमी दबाव में झुकता है, तो वह यूरेशिया क्षेत्र में अपनी ऐतिहासिक साख खो सकता है।
"भारत की कूटनीति का असली इम्तिहान बहुपक्षीय मंचों पर अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने में है। पीएम मोदी का पुतिन और पेजेश्कियान के साथ गर्मजोशी से मिलना यह दर्शाता है कि भारत किसी भी ब्लॉक की राजनीति का हिस्सा नहीं बनेगा, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखेगा।"
| रणनीतिक आयाम | अमेरिका और पश्चिमी सहयोगी | रूस और ईरान (ब्रिक्स) |
|---|---|---|
| आर्थिक संबंध | हाई-टेक व्यापार, रक्षा सौदे और भारी निवेश। | रुपया-रूबल तंत्र, तेल आयात और चाबहार बंदरगाह विकास। |
| भू-राजनीतिक संरेखण | भारत-प्रशांत सुरक्षा, क्वाड गठबंधन, चीन का मुकाबला। | बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था, रणनीतिक स्वायत्तता, ऐतिहासिक मित्रता। |
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उभरती वैश्विक व्यवस्था
मूल रूप से 2009 में ब्राजील, रूस, भारत और चीन द्वारा गठित 'ब्रिक' (बाद में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से ब्रिक्स) का उद्देश्य वैश्विक आर्थिक प्रणाली में सुधार करना था। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में, विशेष रूप से यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बाद, यह समूह भू-राजनीतिक मोर्चे पर अधिक सक्रिय हो गया है। ईरान और रूस अब इसे अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व और पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों (जैसे SWIFT) के विकल्प के रूप में विकसित करना चाहते हैं। भारत इस आर्थिक विविधीकरण का समर्थन तो करता है, लेकिन वह ब्रिक्स को पूरी तरह से एक अमेरिका-विरोधी मोर्चे में बदलने के खिलाफ है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ईरान के राष्ट्रपति ने क्या मुख्य संदेश दिया?
उत्तर: ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने साफ किया कि ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों और 'अहंकार' के आगे नहीं झुकेगा और वह ब्रिक्स के माध्यम से एक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था का समर्थन करता है।
प्रश्न 2: भारत के लिए चाबहार बंदरगाह क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: चाबहार बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को बाईपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच प्रदान करता है, जिससे यह भारत के लिए भू-राजनीतिक और आर्थिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।