नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत ने ईरान और यूएई के बीच गहरे मतभेदों को दूर कर एक संयुक्त घोषणापत्र तैयार करवाया है। यह उपलब्धि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता मानी जा रही है।
- भारत ने ईरान और यूएई के बीच मध्य-पूर्व युद्ध को लेकर चल रहे विवाद को सुलझाकर संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति बनाई।
- घोषणापत्र में किसी विशेष देश का नाम लिए बिना 'एकतरफा युद्ध' की निंदा की जाएगी।
- ब्रिक्स का विस्तार अब वैश्विक जनसंख्या के लगभग आधे हिस्से और दुनिया की 40% अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है।
नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के दौरान भारत ने अपनी सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती को पार कर लिया है। भारत की अध्यक्षता में, ब्रिक्स के सदस्य देशों ने एक संयुक्त घोषणापत्र (Delhi Declaration) पर सहमति व्यक्त की है। यह समझौता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच खाड़ी युद्ध और अमेरिका-इजरायल संघर्ष को लेकर गहरे मतभेद थे, जिसने पिछले कई दौर की वार्ताओं को बाधित किया था।
सूत्रों के अनुसार, इस दस्तावेज़ की भाषा को बहुत सावधानी से तैयार किया गया है। इसमें किसी भी विशिष्ट देश का नाम नहीं लिया जाएगा, लेकिन यह किसी भी राष्ट्र द्वारा किए गए 'एकतरफा युद्ध' की कड़ी निंदा करेगा। यह फॉर्मूला ईरान की उन मांगों को पूरा करता है जिसमें वह अमेरिका-इजरायल हमलों की निंदा चाहता था, जबकि यूएई के लिए यह उसकी संप्रभुता पर हुए हमलों के संदर्भ में स्वीकार्य है।
Why This Matters
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह समझौता भारत की उस रणनीति की जीत है जिसमें वह ब्रिक्स को "गैर-पश्चिमी लेकिन पश्चिम-विरोधी नहीं" (non-Western but not anti-Western) बनाए रखना चाहता है। यदि यह घोषणापत्र विफल रहता, तो यह भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक विफलता होती, खासकर तब जब मई में विदेश मंत्रियों की बैठक में सदस्य देश किसी साझा बयान पर सहमत नहीं हो पाए थे।
"ब्रिक्स का विस्तार इसकी ताकत तो बढ़ाता है, लेकिन विविध राजनीतिक हितों के कारण आम सहमति बनाना अब पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है।"
ऐतिहासिक रूप से, ब्रिक्स की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के रूप में हुई थी, जिसमें 2010 में दक्षिण अफ्रीका शामिल हुआ। हालिया विस्तार के बाद अब इसमें ईरान, सऊदी अरब और अन्य देश शामिल हैं। यह समूह अब वैश्विक अर्थव्यवस्था का 40% हिस्सा है, लेकिन सदस्य देशों के बीच आपसी विवाद, जैसे ईरान और यूएई का टकराव, इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठाते रहे हैं।
भारत के 'शेरपास' (वरिष्ठ अधिकारियों) ने कई दिनों तक गहन बातचीत की ताकि एक ऐसा मध्यम मार्ग निकाला जा सके जिससे सभी 11 सदस्य संतुष्ट हों। यह समझौता दिखाता है कि भारत वैश्विक मंच पर एक मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका को मजबूत कर रहा है, जो विपरीत विचारधारा वाले देशों को एक मेज पर ला सकता है।
तुलना: मई बैठक बनाम सितंबर शिखर सम्मेलन
| विशेषता | मई विदेश मंत्री बैठक | सितंबर शिखर सम्मेलन (दिल्ली) |
|---|---|---|
| परिणाम | संयुक्त बयान में विफलता | संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति |
| मुख्य बाधा | ईरान-यूएई विवाद | सफल कूटनीतिक मध्यस्थता |
| दस्तावेज़ | केवल चेयर स्टेटमेंट | पूर्ण दिल्ली डिक्लेरेशन |
Frequently Asked Questions
1. दिल्ली घोषणापत्र का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य ब्रिक्स के विस्तारित सदस्य देशों के बीच आपसी मतभेदों को कम करना और वैश्विक मुद्दों पर एक साझा दृष्टिकोण प्रस्तुत करना है।
2. भारत के लिए यह जीत क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि मेजबान देश के रूप में, एक सर्वसम्मत घोषणापत्र भारत की नेतृत्व क्षमता और कूटनीतिक कौशल को दुनिया के सामने प्रदर्शित करता है।