भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के उद्घाटन में वैश्विक शासन में बदलाव की मांग की, यह कहते हुए कि ग्लोबल साउथ के देशों को उन निर्णयों का सामना करना पड़ता है जिन्हें वे नहीं बना सकते। उन्होंने विशेषाधिकार की पिरामिड को समानता आधारित प्रणाली से बदलने का आह्वान किया।
- ग्लोबल साउथ के देशों को निर्णय‑निर्माण में सीमित आवाज़
- ‘विशेषाधिकार की पिरामिड’ को समानता‑आधारित प्रणाली से बदलने का आह्वान
- ब्रिक्स के मंच पर नई वैश्विक शासन संरचना की मांग
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का उद्घाटन
नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक शासन की मौजूदा व्यवस्था को ‘विशेषाधिकार की पिरामिड’ कहा। उन्होंने कहा कि यह संरचना विकासशील देशों, विशेषकर ग्लोबल साउथ, को निरंतर हाशिए पर रखती है।
ग्लोबल साउथ की स्थिति पर प्रकाश
मोदी ने उल्लेख किया कि कई ग्लोबल साउथ देशों को ऐसी नीतियों का बोझ उठाना पड़ता है जो वे स्वयं नहीं बना सकते। यह असमानता न केवल आर्थिक विकास को बाधित करती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
‘पिरामिड ऑफ़ प्रिविलेज’ को बदलने का प्रस्ताव
प्रधानमंत्री ने ‘पिरामिड ऑफ़ प्रिविलेज’ को तोड़कर एक समानता‑आधारित प्रणाली स्थापित करने की मांग की। इस नई प्रणाली में सभी देशों को समान वोटिंग अधिकार और नीति‑निर्माण में बराबर भागीदारी मिलेगी, यह उनका लक्ष्य है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ब्रिक्स समूह, जिसकी स्थापना 2009 में हुई, ने विकासशील देशों को आर्थिक सहयोग और बहुपक्षीय मंच प्रदान करने का लक्ष्य रखा। हालांकि, पिछले दशकों में इस समूह की संरचना में विकसित देशों का प्रमुख प्रभाव बना रहा है, जिससे ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व में कमी आई है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that a shift towards a more inclusive governance model could recalibrate trade flows, investment patterns, and diplomatic alliances, potentially reducing the dominance of traditional Western financial institutions.
“यदि ग्लोबल साउथ को वास्तविक निर्णय‑शक्ति मिलती है, तो वैश्विक आर्थिक असमानताएँ घट सकती हैं।” – अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर डॉ. रिया सिंह
Frequently Asked Questions
Q: ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ‘पिरामिड ऑफ़ प्रिविलेज’ को बदलने का क्या अर्थ है?
A: इसका अर्थ है कि सभी सदस्य देशों को समान मतदान अधिकार और नीति‑निर्माण में बराबर भागीदारी देना, जिससे शक्ति का अधिक संतुलन स्थापित हो।
Q: इस प्रस्ताव के कार्यान्वयन से ग्लोबल साउथ को कैसे लाभ होगा?
A: उन्हें अंतरराष्ट्रीय निर्णय‑प्रक्रिया में अधिक आवाज़ मिलेगी, जिससे उनकी आर्थिक और सामाजिक विकास की संभावनाएँ बढ़ेंगी।