प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंधों को मजबूत करने के लिए चर्चा की। अब उनकी नजरें राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली उस महत्वपूर्ण बैठक पर हैं, जिसमें सीमा विवाद और व्यापार घाटे जैसे गंभीर मुद्दों पर बात होगी।
- पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन ने 2030 तक व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा।
- भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा बढ़कर 112 अरब डॉलर हो गया है, जो आगामी बैठक का मुख्य केंद्र होगा।
- रूस के साथ S-400 और Su-57 जैसे रक्षा सौदों पर चर्चा हुई, जबकि चीन के साथ सीमा प्रबंधन प्राथमिकता है।
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अत्यंत जटिल कूटनीतिक संतुलन साधा है। शुक्रवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ 45 मिनट की गहन बैठक के बाद, अब प्रधानमंत्री शनिवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करेंगे। यह बैठक सात वर्षों में शी जिनपिंग की पहली भारत यात्रा के लिहाज से अत्यधिक प्रतीकात्मक और महत्वपूर्ण है।
रूस के साथ हुई बैठक में भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को दोहराया। दोनों नेताओं ने रक्षा सहयोग को गहरा करने पर चर्चा की, जिसमें ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली का अपग्रेडेशन, S-400 की शेष डिलीवरी और संभावित Su-57 लड़ाकू विमानों की आपूर्ति शामिल है। ऊर्जा क्षेत्र में, दोनों देशों ने नागरिक परमाणु सहयोग का विस्तार करने और रूसी तेल के निरंतर प्रवाह को सुनिश्चित करने पर सहमति जताई, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए रीढ़ की हड्डी है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, भारत का यह 'टाइटरोप वॉक' (तनावपूर्ण संतुलन) यह दर्शाता है कि नई दिल्ली न तो पूरी तरह पश्चिमी खेमे में जाना चाहती है और न ही चीन-रूस के गठबंधन का हिस्सा बनना चाहती है। भारत BRICS का उपयोग एक ऐसे मंच के रूप में कर रहा है जहाँ वह अपनी रक्षा जरूरतों के लिए रूस को सुरक्षित रख सके और चीन के साथ सीमा विवाद को सुलझाते हुए व्यापारिक असंतुलन को कम कर सके।
"भारत की विदेश नीति वर्तमान में 'बहु-संरेखण' (Multi-alignment) के दौर से गुजर रही है, जहाँ वह परस्पर विरोधी शक्तियों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों को साधने की क्षमता रखता है।"
चीन के साथ आगामी बैठक में सबसे बड़ा मुद्दा व्यापार घाटा होगा। 2019 में जो घाटा लगभग 11 अरब डॉलर था, वह अब बढ़कर 112 अरब डॉलर हो गया है। भारत अब चीनी बाजारों में अपने फार्मास्यूटिकल्स, आईटी और कृषि उत्पादों के लिए निष्पक्ष पहुंच की मांग करेगा। इसके साथ ही, एनएसए अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच बीजिंग में हुई हालिया बातचीत की समीक्षा की जाएगी ताकि सीमा पर पूर्ण विसैन्यीकरण और स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
| क्षेत्र | रूस के साथ संबंध (Putin Meet) | चीन के साथ संबंध (Xi Meet) |
|---|---|---|
| मुख्य फोकस | रक्षा, परमाणु ऊर्जा और व्यापार वृद्धि | सीमा विवाद और व्यापार घाटा |
| व्यापार लक्ष्य | 2030 तक $100 बिलियन | $112 बिलियन के घाटे को कम करना |
| रणनीतिक स्थिति | स्थिर और गहरा होता सहयोग | सतर्क बहाली और तनावपूर्ण शांति |
इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी इथियोपिया, मलेशिया, अबू धाबी और वियतनाम के नेताओं से भी मुलाकात करेंगे। 2026 के BRICS अध्यक्ष के रूप में, भारत इस समूह को 'पश्चिम-विरोधी' छवि से हटाकर व्यावहारिक सहयोग, जैसे कि महत्वपूर्ण खनिजों और आपूर्ति श्रृंखलाओं के प्रबंधन की ओर ले जाना चाहता है।
Frequently Asked Questions
1. भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा इतना अधिक क्यों है?
भारत चीन से भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और सक्रिय दवा सामग्री (API) आयात करता है, जबकि भारतीय निर्यात चीन के सख्त बाजार नियमों के कारण सीमित है।
रूस ऐतिहासिक रूप से भारत का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता रहा है और S-400 जैसे उन्नत सिस्टम भारत की हवाई सुरक्षा के लिए अनिवार्य हैं।