सऊदी अरब ब्रिक्स (BRICS) के साथ गहरे आर्थिक संबंध बना रहा है, लेकिन अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को संतुलित करने के लिए उसने अभी तक औपचारिक सदस्यता नहीं ली है। जानिए रियाद की इस कूटनीतिक चाल के पीछे का असली कारण।
- सऊदी अरब ने 2023 में ब्रिक्स में शामिल होने का निमंत्रण प्राप्त किया था, लेकिन अभी तक औपचारिक रूप से शामिल नहीं हुआ है।
- रियाद चीन और भारत जैसे प्रमुख आर्थिक भागीदारों के साथ अपने संबंध मजबूत करना चाहता है।
- अमेरिका के साथ सुरक्षा और रक्षा संबंधों को बनाए रखना सऊदी अरब की प्राथमिकता है।
- सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को तेल से इतर अन्य क्षेत्रों में विविधता प्रदान कर रहा है।
नई दिल्ली में आयोजित 2026 के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल साउद ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि, सऊदी अरब की स्थिति ब्रिक्स के भीतर काफी अनूठी है। जबकि इसे 2023 में समूह में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था, रियाद ने अभी तक औपचारिक रूप से इस निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया है।
सऊदी अरब के लिए ब्रिक्स का मंच एक महत्वपूर्ण आर्थिक अवसर है। भारत और चीन सऊदी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं। जैसे-जैसे रियाद अपनी अर्थव्यवस्था को 'विजन 2030' के तहत तेल पर निर्भरता कम करने और गैर-तेल निर्यात बढ़ाने की दिशा में बढ़ रहा है, ब्रिक्स जैसे मंच उसे नए व्यापारिक रास्ते और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने की संभावना प्रदान करते हैं।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि सऊदी अरब की यह 'वेट एंड वॉच' (रुको और देखो) नीति वैश्विक भू-राजनीति में एक मास्टरस्ट्रोक है। वह एक तरफ उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ जुड़ना चाहता है, तो दूसरी तरफ अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता को कम नहीं करना चाहता।
सऊदी अरब एक ऐसा संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है जहां वह पूर्व (East) के आर्थिक लाभ ले सके बिना पश्चिम (West) के सुरक्षा कवच को खोए।
इस कूटनीतिक दुविधा का सबसे बड़ा कारण अमेरिका के साथ सऊदी अरब के गहरे संबंध हैं। अमेरिका, विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के दौरान, ब्रिक्स को पश्चिमी प्रभाव को चुनौती देने वाले समूह के रूप में देखता है। चूंकि सऊदी अरब अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिकी रक्षा प्रणालियों और तकनीक पर अत्यधिक निर्भर है, इसलिए ब्रिक्स की पूर्ण सदस्यता उसके साथ चल रहे महत्वपूर्ण समझौतों को जटिल बना सकती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ब्रिक्स (BRICS) का गठन दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर लाने के लिए किया गया था। 2023 के जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन में सऊदी अरब, मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई को शामिल करने का निमंत्रण दिया गया था, जिसने वैश्विक शक्ति संतुलन में एक बड़ा बदलाव लाने का संकेत दिया था।
| विशेषता | ब्रिक्स के साथ जुड़ाव | अमेरिका के साथ संबंध |
|---|---|---|
| मुख्य फोकस | आर्थिक विविधीकरण और नया व्यापार | सुरक्षा, रक्षा और तकनीक |
| रणनीतिक स्थिति | अतिथि/आमंत्रित देश | प्रमुख सुरक्षा भागीदार |
Frequently Asked Questions
1. क्या सऊदी अरब ब्रिक्स का सदस्य है?
सऊदी अरब को आमंत्रित किया गया है और वह शिखर सम्मेलनों में भाग लेता है, लेकिन उसने अभी तक औपचारिक सदस्यता स्वीकार नहीं की है।
2. भारत और सऊदी अरब के बीच व्यापारिक संबंध कैसे हैं?
2024-25 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 41.88 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है।