कन्नूर की हलाल फायिदा को-ऑपरेटिव सोसाइटी ने वित्तीय पतन और निवेश घोटाले के दावों का खंडन किया है। सोसाइटी ने स्पष्ट किया कि उसने कभी जमा राशि (deposits) नहीं ली, बल्कि केवल शेयर पूंजी एकत्र की थी।
- हलाल फायिदा को-ऑपरेटिव सोसाइटी ने निवेश घोटाले या वित्तीय पतन के सभी आरोपों को खारिज किया है।
- सोसाइटी ने स्पष्ट किया कि उसने जनता से कोई जमा राशि नहीं ली, केवल सदस्यों से शेयर पूंजी ली थी।
- एक निवासी की शिकायत राशि वापस मिलने के बाद वापस ले ली गई, लेकिन विधायक अभी भी जांच की मांग कर रहे हैं।
कन्नूर स्थित हलाल फायिदा को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, जो CPI(M) के नेतृत्व में एक इस्लामिक बैंकिंग पहल के रूप में शुरू की गई थी, ने निवेश घोटाले के आरोपों का कड़ा खंडन किया है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब मय्यिल निवासी के.पी. नासिर ने शिकायत की कि सोसाइटी में निवेश किया गया उनका पैसा वापस नहीं मिला। इस मामले ने तब तूल पकड़ा जब तलीपरम्बा विधायक टी.के. गोविंदन ने इस शिकायत को मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन को भेजा।
एक विस्तृत बयान में, सोसाइटी के अध्यक्ष सी. अब्दुल करीम ने कहा कि वित्तीय अनियमितताओं के आरोप पूरी तरह निराधार हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हालांकि सोसाइटी के नियमों (bylaws) में जमा राशि स्वीकार करने का प्रावधान था, लेकिन वास्तव में किसी से कोई जमा राशि नहीं ली गई। प्रबंधन के अनुसार, सोसाइटी ने 6,913 शेयरों के माध्यम से ₹17.28 लाख एकत्र किए थे, जिसमें से ₹6.65 लाख कार्यालय बुनियादी ढांचे और कंप्यूटर उपकरणों पर खर्च किए गए।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला सामुदायिक वित्तीय पहलों और राजनीतिक निगरानी के बीच के तनाव को दर्शाता है। जब सहकारी समितियां विशिष्ट वैचारिक या धार्मिक आधार पर काम करती हैं, तो फंड वितरण में किसी भी देरी को अक्सर 'घोटाले' के रूप में पेश किया जाता है। श्री नासिर की शिकायत का त्वरित समाधान—धनवापसी के माध्यम से—तरलता की क्षमता को दर्शाता है, लेकिन विधायक द्वारा जांच की मांग सोसाइटी के दीर्घकालिक शासन पर सवाल उठाती है।
'जमा राशि' और 'शेयर पूंजी' के बीच कानूनी अंतर बहुत बड़ा है; जमा राशि एक ऋण है जिसे ब्याज सहित लौटाना होता है, जबकि शेयर पूंजी स्वामित्व का प्रतिनिधित्व करती है जिसके निकासी नियम अलग होते हैं।
ऐतिहासिक रूप से, सोसाइटी की योजना एक बड़े पैमाने पर मांस प्रसंस्करण संयंत्र (meat-processing plant) स्थापित करने की थी। प्रबंधन ने खुलासा किया कि उन्होंने भूमि के लिए KINFRA से संपर्क किया था और प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी जमा की थी। हालांकि, कोविड-19 महामारी और क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।
सोसाइटी ने अपनी पारदर्शिता का बचाव करते हुए कहा कि सहयोग विभाग द्वारा 2017-18, 2018-19 और 2019-20 के लिए किए गए ऑडिट में कोई वित्तीय अनियमितता नहीं पाई गई। 2018-19 की ऑडिट रिपोर्ट में प्रबंधन समिति की शुरुआती गतिविधियों की सराहना की गई थी।
| विशेषता | आरोप | सोसाइटी का पक्ष |
|---|---|---|
| निधियों की प्रकृति | निवेश जमा (Deposits) | केवल शेयर पूंजी |
| वित्तीय स्थिति | पतन/धोखाधड़ी | परिचालन और ऑडिटेड |
| परियोजना स्थिति | फर्जी/गैर-मौजूद | महामारी/बाढ़ से विलंबित |
6 मार्च, 2025 को एक नई प्रबंधन समिति ने कार्यभार संभाला है, जिसका उद्देश्य सोसाइटी को पुनर्जीवित करना है। संगठन के भविष्य के पाठ्यक्रम पर चर्चा करने के लिए सितंबर में शेयरधारकों की एक बैठक प्रस्तावित है। अध्यक्ष अब्दुल करीम ने सदस्यों से "भ्रामक प्रचार" का शिकार न होने की अपील की है और आश्वासन दिया है कि किसी भी शेयरधारक को नुकसान नहीं होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: मांस प्रसंस्करण संयंत्र की परियोजना में देरी क्यों हुई?
सोसाइटी ने KINFRA के साथ शुरुआती योजना के बावजूद कोविड-19 महामारी और क्षेत्रीय बाढ़ को मुख्य कारण बताया है।
प्रश्न 2: क्या हलाल फायिदा के शेयरधारक अपना पैसा निकाल सकते हैं?
हाँ, नियमों के अनुसार, शेयरधारक तीन साल की अवधि पूरी करने के बाद अपनी शेयर राशि की निकासी का अनुरोध कर सकते हैं।