मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु के सभी ट्रायल कोर्ट को महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों का निपटारा दो महीने के भीतर करने का सख्त निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि बिना किसी ठोस कारण के सुनवाई में स्थगन (adjournment) नहीं दिया जाना चाहिए।
मुख्य बातें
- मद्रास हाई कोर्ट ने यौन अपराधों के मामलों में 2 महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का आदेश दिया।
- बिना लिखित और असाधारण कारणों के स्थगन (adjournment) देने पर रोक।
- POCSO मामलों में बच्चों के बयान 30 दिनों के भीतर दर्ज करने का निर्देश।
- पुलिस और राज्य सरकार को विशेष टास्क फोर्स और प्रशिक्षित अधिकारियों की नियुक्ति सुनिश्चित करने को कहा गया।
मद्रास उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए तमिलनाडु के सभी निचली अदालतों को निर्देश दिया है कि वे महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से संबंधित मामलों में हर संभव प्रयास करें ताकि ट्रायल को दो महीने के भीतर पूरा किया जा सके। मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि स्थगन (adjournment) केवल "वास्तव में असाधारण" कारणों से ही दिया जाना चाहिए और उन कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना अनिवार्य होगा।
कानूनी अनिवार्यता और BNSS के प्रावधान
अदालत ने रजिस्ट्रार जनरल को एक सर्कुलर जारी करने का निर्देश दिया है, जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 346(1) के तहत वैधानिक आवश्यकता को दोहराता है। इसके तहत पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल करने के दो महीने के भीतर ट्रायल पूरा करना आवश्यक है। इसके अलावा, POCSO अधिनियम, 2012 के तहत विशेष अदालतों को निर्देश दिया गया है कि वे बाल पीड़ितों के साक्ष्य 30 दिनों के भीतर दर्ज करें और एक वर्ष के भीतर मामला समाप्त करें।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि न्याय में देरी वास्तव में न्याय से इनकार करने के समान है। तमिलनाडु में लंबित मामलों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पुलिस महानिदेशक (DGP) की रिपोर्ट के अनुसार, 1,920 लंबित बलात्कार मामलों में से केवल 54% में ही 60 दिनों के भीतर अंतिम रिपोर्ट दर्ज की गई थी। यह आदेश न्यायिक प्रक्रिया में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
न्यायिक देरी पीड़ितों के मानसिक स्वास्थ्य और समाज में कानून के डर को कम करती है; यह आदेश उस दरार को भरने का प्रयास है।
तुलनात्मक आंकड़े: लंबित मामलों की स्थिति
| मामले का प्रकार | कुल लंबित मामले | समय सीमा के भीतर रिपोर्ट (अनुमानित) |
|---|---|---|
| बलात्कार (Rape) | 1,920 | 54.0% |
| POCSO मामले | 18,518 | 70.1% |
अदालत ने राज्य सरकार को कुड्डालोर, डिंडीगुल, मदुरै और थूथुकुडी में खाली पड़े POCSO न्यायालयों में जल्द से जल्द पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति करने का भी निर्देश दिया है। साथ ही, पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया गया है कि वे यह सुनिश्चित करें कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों पर नज़र रखने के लिए हर जिले में एक प्रभावी विशेष टास्क फोर्स कार्य करे।
Frequently Asked Questions
1. मद्रास हाई कोर्ट ने स्थगन (adjournment) के संबंध में क्या कहा?
अदालत ने कहा कि स्थगन केवल असाधारण कारणों से ही दिया जाना चाहिए और उन कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना अनिवार्य है।
2. POCSO मामलों के लिए क्या समय सीमा निर्धारित की गई है?
अधिनियम के अनुसार, बाल पीड़ितों के साक्ष्य 30 दिनों के भीतर दर्ज किए जाने चाहिए और ट्रायल को एक वर्ष के भीतर समाप्त किया जाना चाहिए।