भारत के सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम ने भारत प्रथम के साथ अपने साक्षात्कार में समान नागरिक संहिता (UCC) को अनिवार्य बताया। उन्होंने विधायी अधिकार, न्यायिक भूमिका और व्यक्तिगत कानूनों के असमानता‑भरे पहलुओं पर प्रकाश डाला।

  • समान नागरिक संहिता (UCC) को संविधान के तहत अनिवार्य माना जाना चाहिए।
  • कानून बनाना संसद व राज्य सभाओं की प्राथमिकता है, न्यायालय केवल संवैधानिक वैधता जाँचता है।
  • व्यक्तिगत कानूनों की असमानता मौलिक समानता और सार्वजनिक हित के विरुद्ध है।

आर्यमा सुंदरम का UCC पर दृष्टिकोण

भारत प्रथम के एक साक्षात्कार में वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम ने कहा, “सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता अनिवार्य है।” उन्होंने विवाह, तलाक और वारिसी अधिकारों जैसे नागरिक मामलों को राज्य द्वारा एक समान रूप से नियंत्रित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

धर्मिक प्रथा बनाम नागरिक कोड

सुंदरम ने स्पष्ट किया कि धार्मिक प्रथा (ecclesiastical practice) और नागरिक कोड के बीच स्पष्ट अंतर है। जबकि धार्मिक रीति‑रिवाज़ व्यक्तिगत विश्वास पर आधारित होते हैं, नागरिक कोड को राज्य की शक्ति से लागू किया जाना चाहिए, जिससे सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलें।

विधायी बनाम न्यायिक प्राधिकार

उन्होंने बताया कि कानून बनाना संसद और राज्य विधानसभा का अधिकार है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय का काम केवल तब हस्तक्षेप करना है जब किसी कानून की संवैधानिक वैधता पर प्रश्न उठे। यह विभाजन लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूलभूत संरचना को सुरक्षित रखता है।

ऐतिहासिक उदाहरण: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम

सुंदरम ने भारत में विभिन्न राज्यों में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के क्रमिक संशोधनों को उदाहरण के तौर पर दिया, जिससे स्पष्ट होता है कि समान नागरिक कानूनों का क्रमिक कार्यान्वयन संभव है।

निर्देशात्मक सिद्धांत और नैतिकता

उन्होंने कहा कि निर्देशात्मक सिद्धांत (Directive Principles) राष्ट्रीय प्रगति के मार्गदर्शक हैं और व्यक्तिगत कानून जो व्यक्तियों को असमान रूप से व्यवहार करते हैं, वे मूल नैतिकता, सार्वजनिक हित और संवैधानिक समानता के विरुद्ध हैं।

Historical Background

भारत में समान नागरिक संहिता का विचार 1950 के दशक से ही राष्ट्रीय बहस का हिस्सा रहा है। 1955 में संविधान सभा की रिपोर्ट, 1976 के राजनैतिक सुधार, और 2019 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने इस दिशा में विभिन्न पहलें कीं, परन्तु अभी तक एक सार्वभौमिक कोड लागू नहीं हुआ है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that एक समान नागरिक संहिता न केवल सामाजिक समावेश को बढ़ावा देगी, बल्कि न्यायिक बोझ को भी कम करेगी, जिससे भारत की आर्थिक और अंतर्राष्ट्रीय छवि में सुधार होगा।

"UCC का कार्यान्वयन भारतीय लोकतंत्र की प्रगतिशीलता का सबसे बड़ा परीक्षण है," कहते हैं संविधान विशेषज्ञ प्रो. रवींद्र कुमार।
Did You Know?: भारत में पहले 1950 के दशक में ही एक समान नागरिक कोड का मसौदा तैयार किया गया था, लेकिन उसे राजनीतिक असहमति के कारण टाल दिया गया।

Frequently Asked Questions

UCC को लागू करने में सबसे बड़ी बाधा क्या है? सामाजिक और धार्मिक समूहों का विरोध तथा राजनीतिक असहमति प्रमुख चुनौतियां हैं।

क्या वर्तमान व्यक्तिगत कानूनों को तुरंत निरस्त किया जा सकता है? नहीं, उन्हें संसद द्वारा संशोधित या प्रतिस्थापित करना होगा, साथ ही न्यायालय की संवैधानिक समीक्षा भी आवश्यक होगी।