पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2018 के चर्चित 'लाडली' बलात्कार और हत्या मामले में जांच में गंभीर खामियों को देखते हुए मामले की नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया है। अदालत ने पुलिस की लापरवाही पर कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि न्यायपालिका ऐसे जघन्य अपराधों में केवल 'मूक दर्शक' नहीं बनी रह सकती।
मुख्य बातें
- हाईकोर्ट ने 2018 के 'लाडली' मामले में जांच में 'गंभीर खामियों' को पाया।
- पुलिस अधिकारियों द्वारा FSL रिपोर्ट डॉक्टरों को न भेजने पर अदालत ने नाराजगी जताई।
- अदालत ने मृत्युदंड को रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से ट्रायल कोर्ट भेजने का आदेश दिया।
- न्यायाधीशों ने कहा कि अदालतें ऐसे जघन्य अपराधों में मूक दर्शक नहीं रह सकतीं।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतें जघन्य अपराधों के मामले में केवल 'मूक दर्शक' बनकर नहीं रह सकतीं। न्यायमूर्ति अनूप चितकारा और न्यायमूर्ति रमेश चंद्र दिमरी की खंडपीठ ने 2018 के बहुचर्चित 'लाडली' बलात्कार और हत्या मामले में सुनवाई करते हुए यह सख्त रुख अपनाया।
मामला 2018 का है, जब 12 वर्षीय बच्ची, जिसे अदालत ने सम्मानपूर्वक 'लाडली' संबोधित किया, घर से कचरा फेंकने निकली थी और फिर कभी वापस नहीं लौटी। बाद में उसका शव गांव की चौपाल के पीछे मिला था। निचली अदालत ने 2022 में दो आरोपियों को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई थी, जिसे अब उच्च न्यायालय ने पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मामला आपराधिक जांच में पुलिस की जवाबदेही और प्रक्रियात्मक शुद्धता पर गंभीर सवाल उठाता है। अदालत ने पाया कि जांच अधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट डॉक्टरों को वापस नहीं भेजी, जिससे यौन शोषण की पुष्टि पर डॉक्टरों की अंतिम राय नहीं मिल सकी। अदालत ने इसे 'घोर लापरवाही' करार दिया।
"हम ऐसे जघन्य और क्रूर अपराध में मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकते और न ही चुप्पी साधकर शक्तिहीन हो सकते हैं।" - अदालत की टिप्पणी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह एक 'अवैधता' नहीं बल्कि एक 'अनियमितता' है, जिसे सुधारा जा सकता है। अदालत ने निर्देश दिया है कि ट्रायल कोर्ट डॉक्टरों को बुलाकर उनका साक्ष्य दर्ज करे और आरोपियों को अपनी सफाई पेश करने का पूरा मौका दे।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
जनवरी 2018 में हुई इस घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया था। जांच के दौरान पुलिस ने कुछ गवाहों के बयानों के आधार पर दो पुरुषों को गिरफ्तार किया था, लेकिन चिकित्सा साक्ष्यों की उचित प्रक्रिया का पालन न करना इस मामले का सबसे कमजोर कड़ी साबित हुआ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. हाईकोर्ट ने मृत्युदंड को क्यों रद्द किया?
अदालत ने पाया कि जांच में महत्वपूर्ण प्रक्रियात्मक खामियां थीं, जैसे FSL रिपोर्ट डॉक्टरों को न भेजना, जिससे उचित साक्ष्य का अभाव रहा।
2. अब आगे क्या होगा?
मामला अब ट्रायल कोर्ट में वापस चला गया है, जहां डॉक्टरों के बयान दर्ज किए जाएंगे और आरोपियों को नए सिरे से अपना बचाव करने का अवसर दिया जाएगा।