रथ यात्रा के दौरान फूल खरीदते समय लापता हुई ओडिशा की 70‑साल की महिला अब बंगाल के एक वरिष्ठ नागरिक गृह में मिली। सरकारी आदेश, कोर्ट की दखल और पश्चिम बंगाल रेडियो क्लब के एचएएम रेडियो स्वयंसेवकों की खोज ने उनका परिवार से पुनर्मिलन कराया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • ओडिशा की 70‑साल की महिला रथ यात्रा में लापता हुई, अब बंगाल में मिली
  • पश्चिम बंगाल रेडियो क्लब के एचएएम रेडियो स्वयंसेवकों ने परिवार की पहचान की
  • परिवार को पुनर्मिलन की खुशी, रथ यात्रा में फिर से साथ जाने का वादा

जाने-माने ओडिशा के रथ यात्रा में लगभग दस साल पहले जब बेला बेहरा ने भगवान जगन्नाथ के लिये फूल खरीदने के लिये घर से बाहर कदम रखा, तब वह अज्ञात रह गई। वह एक पुष्प विक्रेता थी, अपने तीन बेटे पाले हुए और सबसे छोटे बेटे के साथ जियागंज, मुर्शिदाबाद में स्थित टोकिया सीनियर सिटिजन होम में रह रही थी।

पृष्ठभूमि और खोज

बेला का लापता होना सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि ओडिशा के कई परिवारों के लिए आशा और धैर्य की परीक्षा बन गया। पुलिस, स्थानीय प्रशासन और होम के अधिकारी कई बार पहचान स्थापित करने की कोशिशों के बावजूद केवल ओड़िया बोलने के कारण असफल रहे। वहीं, ओडिशा में उनका परिवार हर साल पुरी के रथ यात्रा से दूर रह गया, क्योंकि वे अपनी माँ की वापसी की प्रार्थना में व्यस्त थे।

कोर्ट का आदेश और एचएएम रेडियो की भूमिका

हाल ही में बरहामपुर कोर्ट ने टोकिया सीनियर सिटिजन होम को परिवार के पुनर्मिलन की प्रक्रिया तेज करने का निर्देश दिया। इस आदेश के बाद होम की सुपरिंटेंडेंट अर्पिता लाहिरी ने पश्चिम बंगाल रेडियो क्लब से मदद मांगी। क्लब के स्वयंसेवकों ने एचएएम (हैम) रेडियो नेटवर्क का उपयोग करके गंजाम जिले के मूल गाँव की पहचान की और बेला के परिवार से संपर्क स्थापित किया।

वीडियो कॉल और भावनात्मक पुनर्मिलन

स्वयंसेवकों द्वारा व्यवस्थित वीडियो कॉल में बेला के छोटे बेटे केशव ने पहली बार अपनी माँ को देख लिया। आँसू और भावनाओं से भरपूर इस क्षण में केशव ने स्वयंसेवकों को "भगवान जगन्नाथ के संदेशवाहक" कहा, यह मानते हुए कि यही शक्ति उनके माँ को वापस लाने में काम आई। उसी समय बेला की माँ ने दस दिन पहले ही निधन कर दिया था, जब वह अपने गायब बेटी के बारे में प्रार्थना कर रही थीं।

भविष्य की योजना और सामाजिक महत्व

केशव अब जियागंज से मुर्शिदाबाद तक यात्रा करके सभी औपचारिकताएँ पूरी करेंगे और फिर अपने माता-पिता को ओडिशा वापस ले जाएंगे। इस वर्ष की रथ यात्रा में पूरे परिवार के साथ पुरी जाने की योजना बनी है, जो पिछले दशक की अनिश्चितता को समाप्त करती है। यह कहानी न केवल व्यक्तिगत पुनर्मिलन का प्रतीक है, बल्कि एचएएम रेडियो जैसी सामुदायिक तकनीकी पहल की शक्ति को भी उजागर करती है, जो सामाजिक बंधनों को तोड़ कर मानवता की सेवा करती है।