1963 में स्थापित मायलापुर की पीयर एंड संस घड़ी मरम्मत की दुकान, एस. शाकिल अहमद के माध्यम से अपने पिता की विरासत को संजोए हुए है। यह कहानी केवल घड़ियों की नहीं, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे हुनर और समर्पण की है।

  • पीयर एंड संस की स्थापना 1963 में एस.के. पीयर द्वारा की गई थी।
  • एस. शाकिल अहमद अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए घड़ियों की मरम्मत का काम कर रहे हैं।
  • दुकान में विंटेज ओमेगा से लेकर ग्रैंडफादर क्लॉक तक की मरम्मत की जाती है।

चेन्नई के मायलापुर स्थित कुचेरी रोड पर, जहाँ बकिंघम नहर धीरे-धीरे बहती है, वहाँ एक बेहद छोटी सी दुकान स्थित है जिसका नाम है पीयर एंड संस। यह दुकान केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि समय की अनमोल यादों को संजोने का एक केंद्र है। 1963 में एस.के. पीयर द्वारा स्थापित यह दुकान आज उनके पुत्र एस. शाकिल अहमद के हाथों में है, जो अपने पिता के दिखाए मार्ग पर चलते हुए समय की टिक-टिक को जीवित रखे हुए हैं।

शाकिल अहमद की यह यात्रा 1991 में शुरू हुई थी, जब उन्होंने अपनी दसवीं की परीक्षा के तुरंत बाद अपने पिता के साथ काम करना शुरू किया था। उनके लिए यह केवल एक काम नहीं, बल्कि एक जुनून बन गया। वे बताते हैं कि कैसे अपने पिता को जटिल घड़ियों को ठीक करते देख उन्हें एक अद्भुत शांति और शक्ति का अनुभव होता था। आज, वे अपनी दुकान में घंटों बैठकर मैग्नीफाइंग आईपीस के माध्यम से सूक्ष्म पुर्जों को ठीक करते हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि आधुनिक डिजिटल युग में, जहाँ सब कुछ क्षणभंगुर है, पीयर एंड संस जैसी पारंपरिक दुकानें सांस्कृतिक और तकनीकी विरासत का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस तरह के सूक्ष्म कौशल (micro-skills) लुप्त होने की कगार पर हैं, और शाकिल अहमद जैसे कारीगर इस लुप्त होती कला के रक्षक हैं।

विरासत केवल संपत्ति नहीं होती, बल्कि वह हुनर है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आत्मा के साथ हस्तांतरित होता है।

शाकिल अहमद का कार्यक्षेत्र काफी विविध है। उनकी वर्कबेंच पर सेइको (Seiko) से लेकर 1960 के दशक की ओमेगा (Omega) तक की घड़ियाँ और पुराने जमाने की बड़ी पेंडुलम वाली 'ग्रैंडफादर क्लॉक' तक देखने को मिलती हैं। जब पुर्जे मिलना मुश्किल हो जाता है, तो वे स्वयं उन्हें बनाने का कौशल रखते हैं, जो उनके गहरे अनुभव को दर्शाता है।

हालाँकि, मेट्रो रेल के निर्माण और बदलती जीवनशैली के कारण उन्हें कुछ चुनौतियों का सामना भी करना पड़ा है, लेकिन अपने काम की स्वतंत्रता और संतोष के कारण वे कभी पीछे नहीं मुड़े। उन्होंने अपनी मेहनत से अपने बच्चों को उच्च शिक्षा प्रदान की है, जो उनके संघर्ष और सफलता की कहानी को प्रमाणित करता है।

Did You Know?: पुराने समय में घड़ियों के पुर्जे बनाना एक कला मानी जाती थी, क्योंकि आज की तरह मशीन से बने पुर्जे आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे।

Frequently Asked Questions

1. पीयर एंड संस की स्थापना कब हुई थी?
इस दुकान की स्थापना 1963 में एस.के. पीयर द्वारा की गई थी।

2. यह दुकान किन घड़ियों की मरम्मत करती है?
यह दुकान विंटेज ओमेगा, सेइको और बड़ी पेंडुलम वाली घड़ियों सहित लगभग सभी प्रकार की पुरानी घड़ियों की मरम्मत करती है।