पुणे के वाइल्डनेस विशेषज्ञ सुशील चिकने ने एक दुर्लभ और डरावनी न्यूरोलॉजिकल बीमारी, गिल्लेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) के खिलाफ अपनी अविश्वसनीय लड़ाई साझा की है। यह कहानी शारीरिक विकलांगता से मानसिक शक्ति और पुनरुद्धार तक के सफर की है।
- सुशील चिकने को 2025 में दुर्लभ गिल्लेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) का निदान हुआ।
- GBS एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम तंत्रिका तंत्र (nerves) पर हमला करता है।
- चिकने ने सोशल मीडिया के माध्यम से बीमारी के मानसिक और शारीरिक पहलुओं पर जागरूकता फैलाई।
- उनकी रिकवरी की यात्रा पर्वतारोहण के सिद्धांतों और अटूट इच्छाशक्ति पर आधारित है।
पुणे के बनर-पासन लिंक रोड पर एक लोकप्रिय बिस्ट्रो में, 38 वर्षीय सुशील चिकने एक वॉकर के सहारे चलते हुए प्रवेश करते हैं। उनके हाथों में हल्का कंपन है, लेकिन कॉफी का एक भी कतरा नहीं गिरता। वह बताते हैं, "आज मैं जो नहीं कर सकता, वह है बिना मदद के सीढ़ियां चढ़ना। लेकिन कल हमने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की—अगर मैं गिर जाऊं, तो खुद उठना सीख लिया है। इसमें आधा घंटा लग सकता है, लेकिन मैं खुद खड़ा होऊंगा।"
चिकने की यह यात्रा केवल शारीरिक सुधार की नहीं, बल्कि एक गहरे मानसिक संघर्ष की है। 7 नवंबर, 2025 को उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया था, जिसका शीर्षक था, "अपने शरीर में कैद, लेकिन आखिरकार जाग रहा हूँ..."। उस वीडियो में उन्हें व्हीलचेयर पर, अस्पताल के बिस्तर पर ट्यूब लगे हुए और पूरी तरह असहाय दिखाया गया था। यह पुणे में 2025 में फैले गिल्लेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) के प्रकोप के दौरान का एक बेहद भावुक क्षण था।
GBS का प्रकोप और अचानक आया संकट
वर्ष 2025 की शुरुआत पुणे में GBS के मामलों में अचानक वृद्धि के साथ हुई। जनवरी 2025 तक, शहर में 110 से अधिक संदिग्ध मामले सामने आए थे। सुशील चिकने, जो 'जर्नीज़' (Journeys) नामक ट्रैवल कंपनी के निदेशक हैं, एक सामान्य दिन की तरह काम कर रहे थे जब उन्हें एहसास हुआ कि उनका शरीर साथ छोड़ रहा है। उन्होंने बताया कि एक शाम जब वह कंप्यूटर पर काम कर रहे थे, तो वह माउस तक नहीं चला पा रहे थे। देखते ही देखते, वह अपनी कुर्सी से उठने में भी असमर्थ हो गए।
निदान के बाद का समय उनके लिए नरक जैसा था। वह बताते हैं, "मैं हर दिन रोता था, खुद को और चिकित्सा प्रणाली को कोसता था।" उन्हें अपने शरीर के अंगों, यहाँ तक कि पलकों को बंद करने पर भी नियंत्रण नहीं था। इस अंधेरे समय में, उनकी माँ, कुमुदिनी चिकने के शब्दों ने उन्हें जीवन की ओर वापस मोड़ा: "मैंने तुम्हें इसलिए नहीं पाला ताकि तुम हार मान लो।"
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि GBS जैसी दुर्लभ बीमारियों के मामले में जागरूकता की भारी कमी है। अक्सर मरीजों को गलत तरीके से गठिया (arthritis) समझकर उपचार दिया जाता है, जिससे स्थिति और बिगड़ सकती है। सुशील चिकने ने न केवल अपनी लड़ाई लड़ी, बल्कि सोशल मीडिया का उपयोग करके इस बीमारी के 'मानसिक स्वास्थ्य' पहलुओं को भी उजागर किया, जिसे अक्सर चिकित्सा जगत में नजरअंदाज कर दिया जाता है।
"पर्वतारोहण में हम शिखर को नहीं देखते, क्योंकि वह तनाव पैदा करता है; हम बस एक बार में एक कदम देखते हैं।" - सुशील चिकने
चिकने ने अपनी बीमारी को एक सामाजिक मिशन में बदल दिया। उन्होंने अपनी बहन सुचित्रा और भतीजे नक्ष की मदद से वीडियो और फोटो के जरिए लोगों को शिक्षित करना शुरू किया। उन्होंने बताया कि कैसे लोग अंधविश्वास और नीम-हकीमों के जाल में फंस जाते हैं। उनकी कहानी एक प्रेरणा है कि कैसे एक कठिन समय को दूसरों के लिए रोशनी में बदला जा सकता है।
Frequently Asked Questions
1. गिल्लेन-बैरे सिंड्रोम (GBS) क्या है?
यह एक दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल विकार है जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम नसों पर हमला करता है, जिससे मांसपेशियों में कमजोरी और पक्षाघात हो सकता है।
2. सुशील चिकने की रिकवरी में सबसे महत्वपूर्ण क्या रहा?
उनकी रिकवरी में फिजियोथेरेपी और पर्वतारोहण के 'एक समय में एक कदम' वाले दृष्टिकोण ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।