अभिनेत्री गौहर खान ने अपने बेटे ज़ेहान की परवरिश और करियर के बीच तालमेल बिठाने के अपने संघर्षों और प्राथमिकताओं पर खुलकर बात की है।

  • गौहर खान ने अपने बेटे ज़ेहान की परवरिश में सक्रिय भूमिका निभाने का निर्णय लिया है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआती वर्षों में माता-पिता की भावनात्मक उपस्थिति का कोई विकल्प नहीं है।
  • एक मजबूत सपोर्ट सिस्टम और जीवनसाथी का सहयोग कामकाजी माताओं के लिए अनिवार्य है।

एक सफल करियर और मातृत्व की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना किसी चुनौती से कम नहीं है। गौहर खान, जिन्होंने 2023 में अपने बेटे ज़ेहान का स्वागत किया, इस संतुलन को अपने तरीके से परिभाषित कर रही हैं। शूटिंग और यात्राओं के बावजूद, उन्होंने जानबूझकर अपने बच्चे की परवरिश में सीधे तौर पर शामिल होने का फैसला किया है।

बॉलीवुड बबल के साथ एक हालिया साक्षात्कार में, अभिनेत्री ने खुलासा किया कि हालांकि उनके पास मदद उपलब्ध है, लेकिन वह पूरी तरह से नैनी (आया) पर निर्भर नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह जहां भी काम के लिए जाती हैं, ज़ेहान उनके साथ होता है। गौहर के अनुसार, "अगर आपका सपोर्ट सिस्टम अच्छा है, परिवार और पति का साथ है, तो सब कुछ संभव है।" उन्होंने यह भी कहा कि चाहे उनकी जेब से अतिरिक्त खर्च हो, लेकिन वह अपने बच्चे को साथ रखना पसंद करती हैं।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि गौहर खान का यह दृष्टिकोण शहरी कामकाजी महिलाओं के बीच बदलती सोच को दर्शाता है। आज के दौर में जहां करियर की गति को मातृत्व के कारण बाधित माना जाता है, गौहर का यह कदम साबित करता है कि भावनात्मक उपलब्धता को प्राथमिकता दी जा सकती है।

काउंसलिंग मनोवैज्ञानिक अतुल राज के अनुसार, शुरुआती वर्षों में बच्चे यादें नहीं, बल्कि सुरक्षा और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के पैटर्न बनाते हैं। एक केयरगिवर सुविधा तो दे सकता है, लेकिन माता-पिता के साथ बनने वाला भावनात्मक जुड़ाव अलग होता है। यह बच्चे को सिखाता है कि दुनिया एक सुरक्षित जगह है।

भावनात्मक छाप (Emotional Imprinting) को आउटसोर्स नहीं किया जा सकता; माता-पिता का जुड़ाव बच्चे को सुरक्षा का अहसास कराता है।

शहरी भारत में माताओं पर दबाव बहुत अधिक है, जहां मातृत्व को अक्सर करियर में एक 'रुकावट' के रूप में देखा जाता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जुड़ाव के लिए हर समय शारीरिक उपस्थिति की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि जब आप साथ हों, तब पूरी तरह से भावनात्मक रूप से उपलब्ध होना जरूरी है। इसकी कमी से बच्चे समय से पहले परिपक्व हो जाते हैं और दूसरों से उम्मीदें करना छोड़ देते हैं।

जो माता-पिता सहायता कर्मचारियों पर निर्भर हैं, उनके लिए छोटे और निरंतर अनुष्ठान (Rituals) मददगार हो सकते हैं। जैसे हर रात एक कहानी सुनाना या लंच के बाद एक वीडियो कॉल करना। ये सरल दिनचर्या बच्चे के लिए एक भावनात्मक लंगर का काम करती हैं।

क्या आप जानते हैं?: मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि कम समय के लिए लेकिन पूरी तरह से भावनात्मक रूप से उपस्थित रहना, लंबे समय तक बिना ध्यान दिए साथ रहने से कहीं अधिक प्रभावी होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: क्या गौहर खान नैनी की मदद नहीं लेती हैं?
वह मदद लेती हैं, लेकिन वह पूरी तरह से उन पर निर्भर नहीं हैं और सुनिश्चित करती हैं कि वह स्वयं अपने बच्चे के साथ रहें।

प्रश्न 2: माता-पिता के साथ भावनात्मक जुड़ाव की कमी का क्या प्रभाव पड़ता है?
इससे बच्चे समय से पहले परिपक्व हो सकते हैं और वयस्क होने पर उन्हें दूसरों के साथ जुड़ने या खुद को शांत करने में कठिनाई हो सकती है।