शही कबीर द्वारा लिखित और किरण दास द्वारा निर्देशित 'उन्मादम्' एक पुलिस अधिकारी की कहानी है जो फिल्म लेखक बनने का सपना देखता है। कुंचको बोबन का अभिनय प्रभावशाली है, लेकिन फिल्म अलग-अलग शैलियों के बीच संतुलन बनाने में संघर्ष करती है।

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मुख्य बातें

  • कुंचको बोबन ने एक जटिल पुलिस अधिकारी की भूमिका में बेहतरीन प्रदर्शन किया है।
  • फिल्म पुलिस प्रोसीजरल, मनोवैज्ञानिक और अलौकिक तत्वों का मिश्रण करने की कोशिश करती है।
  • कहानी के उतार-चढ़ाव और शैलियों के बीच संतुलन की कमी फिल्म की कमजोरी है।
  • यह फिल्म पुलिस अधिकारियों के पटकथा लेखक बनने के बढ़ते चलन पर एक कटाक्ष भी हो सकती है।

मलयालम सिनेमा में पुलिस अधिकारियों के पटकथा लेखक बनने का एक नया चलन देखने को मिल रहा है, और 'उन्मादम्' (Unmadham) इसी श्रेणी का एक हिस्सा है। फिल्म की कहानी शेली (कुंचको बोबन) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक पुलिस अधिकारी है लेकिन साथ ही फिल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

निर्देशक किरण दास और लेखक शही कबीर ने एक ऐसी कहानी बुनने की कोशिश की है जो अपराध, मनोविज्ञान और अंधविश्वास के बीच झूलती है। फिल्म के कुछ हिस्से शेली के दिमाग के भीतर चलते हैं, जो उसकी मानसिक उथल-पुथल और काम से उसकी दूरी को दर्शाते हैं। उसकी पत्नी सौम्या (लिजोमोल जोस) के साथ उसके रिश्तों में तनाव भी कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यह क्यों मायने रखता है

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, 'उन्मादम्' जैसी फिल्में केवल मनोरंजन नहीं हैं, बल्कि वे वास्तविक जीवन के अनुभवों और काल्पनिक कथाओं के बीच की धुंधली रेखा को दर्शाती हैं। फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या एक अधिकारी की रचनात्मकता उसके कर्तव्य में बाधा बन सकती है या उसे बेहतर बना सकती है।

कुंचको बोबन का अभिनय फिल्म की जान है, जो कहानी के भटकने के बावजूद दर्शकों को बांधे रखता है।

हालांकि, फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी पटकथा है। जब फिल्म मनोवैज्ञानिक तत्वों से अलौकिक (supernatural) तत्वों की ओर बढ़ती है, तो यह कुछ जगहों पर बहुत सुविधाजनक और अतार्किक लगने लगती है। एक पुराने केस की फाइल, जो कहानी का केंद्र है, उसका खुलासा उतना चौंकाने वाला नहीं है जितना होना चाहिए था।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मलयालम सिनेमा में पिछले कुछ वर्षों में 'पुलिस-टू-राइटर' (Police-to-Writer) की लहर देखी गई है, जहां वास्तविक जीवन के पुलिस अधिकारियों ने अपनी सेवा के दौरान देखे गए अनुभवों को फिल्मों के माध्यम से पर्दे पर उतारा है। शाही कबीर इसी परंपरा के एक प्रमुख स्तंभ हैं।

क्या आप जानते हैं?: 'उन्मादम्' में दिखाया गया 'मेटा-नैरेटिव' (Meta-narrative) तकनीक का उपयोग करता है, जहाँ फिल्म के भीतर की कहानी फिल्म निर्माण की प्रक्रिया पर ही टिप्पणी करती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'उन्मादम्' किस शैली की फिल्म है?
यह एक पुलिस प्रोसीजरल है जिसमें मनोवैज्ञानिक और कुछ हद तक अलौकिक तत्व शामिल हैं।

2. मुख्य अभिनेता कौन हैं?
फिल्म में मुख्य भूमिका कुंचको बोबन ने निभाई है।