एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक 2026 तक मौद्रिक नीति को स्थिर रखेगा क्योंकि आर्थिक वृद्धि के जोखिम महंगाई से अधिक हैं। यह कदम नीति निर्माताओं की सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण को दर्शाता है।

मुख्य बिंदु

  • आरबीआई 2026 तक रेपो दर को अपरिवर्तित रखेगा।
  • वृद्धि जोखिम महंगाई से अधिक गंभीर माने जा रहे हैं।
  • नीति दिशा-निर्देशों में स्थिरता की अपेक्षा।

सर्वेक्षण की मुख्य बातें

रॉयटर्स के सर्वेक्षण में 31 प्रमुख भारतीय अर्थशास्त्रियों और बाजार विश्लेषकों ने राय दी कि मौजूदा आर्थिक माहौल में आरबीआई को दरें स्थिर रखनी चाहिए। अधिकांश उत्तरदाताओं ने कहा कि आर्थिक वृद्धि में संभावित मंदी के संकेत महंगाई को नियंत्रित करने की तुलना में अधिक प्रमुख हैं।

वृद्धि जोखिम बनाम महंगाई

वर्तमान में भारत की महंगाई दर धीमी गति से गिर रही है, लेकिन उत्पादन में गिरावट, निर्यात में कमी और वैश्विक सप्लाई चेन में अड़चनें वृद्धि जोखिम को बढ़ा रही हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि यदि दरें समय से पहले बढ़ाई गईं तो आर्थिक पुनरुद्धार में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows that a prolonged low‑rate environment could boost credit growth, but it also raises concerns about asset‑price bubbles. Maintaining rates until 2026 signals confidence in inflation control while prioritising growth stability.

"यदि आरबीआई दरों को जल्द बदलता है तो छोटे और मध्यम उद्यमों की वित्तीय स्थितियों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है," प्रमुख अर्थशास्त्री डॉ. अंजलि मेहरा ने कहा।
Did You Know?: 1990 के दशक में आरबीआई ने 5 साल तक दरें फ्रीज़ रखी थीं, जिससे उस अवधि में भारतीय शेयर बाजार ने उल्लेखनीय उछाल देखा।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या 2026 तक दरें स्थिर रहने से ऋण की लागत बढ़ेगी?

उत्तर: नहीं, स्थिर दरें आम तौर पर मौजूदा ऋण की लागत को स्थिर रखती हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियों में स्थिरता बनी रहती है।

प्रश्न 2: इस नीति का भारतीय रुपये पर क्या असर होगा?

उत्तर: स्थिर मौद्रिक नीति से विदेशी निवेश आकर्षित हो सकता है, जिससे रुपये की स्थिरता में मदद मिल सकती है।