एक नई रिपोर्ट बताती है कि जनरेशन Z के तेज़ी से बढ़ते प्रवेश ने भारतीय कंपनियों में मेहनत‑से‑कम‑रिटर्न की प्रवृत्ति को तेज़ कर दिया है। इस बदलाव का सबसे बड़ा असर आईटी, प्रोफेशनल सर्विसेज और निर्माण‑इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में दिख रहा है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- जनरेशन Z के 60% भारतीय फर्मों में 'एफ़र्ट रेसिशन' का अनुभव कर रहे हैं
- आईटी, प्रोफेशनल सर्विसेज और रियल एस्टेट सेक्टर सबसे अधिक प्रभावित
- हसल कल्चर के विकल्प के रूप में काम‑जीवन संतुलन पर बढ़ता ज़ोर
भारत में कार्यस्थल का परिदृश्य अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। हाल ही में प्रकाशित एक व्यापक सर्वेक्षण ने दर्शाया है कि जनरेशन Z के कर्मचारियों की प्राथमिकताएँ पारंपरिक "हसल कल्चर" को चुनौती दे रही हैं। इस बदलाव को विशेषज्ञ "एफ़र्ट रेसिशन" शब्द से वर्णित कर रहे हैं, जिसका अर्थ है कम प्रयास में कम परिणाम की निराशा।
जनरेशन Z का प्रभाव और उसका विस्तार
सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग छह में से एक भारतीय फर्म ने बताया कि उनके कर्मचारियों में से 60% ने काम के प्रति अपनी ऊर्जा और प्रतिबद्धता में गिरावट देखी है। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, प्रोफेशनल सर्विसेज और निर्माण‑इन्फ्रास्ट्रक्चर तथा रियल एस्टेट क्षेत्रों में सबसे अधिक स्पष्ट है। इन सेक्टर्स में तेज़ डिजिटल परिवर्तन और प्रोजेक्ट‑आधारित कार्यशैली ने युवा कर्मचारियों की अपेक्षाओं को पुनः परिभाषित किया है।
पार्श्वभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ
पिछले दो दशकों में भारत ने तेज़ आर्थिक विकास के साथ साथ एक बड़े युवा जनसांख्यिकी को भी देखा। 1990 के दशक में आए बूम‑इट‑फ्रीज और 2000 के दशक में आईटी बूम ने एक "हसल" मानसिकता को स्थापित किया, जहाँ लंबी कार्यघंटे को सफलता का मानक माना जाता था। अब, इस जनसांख्यिकीय बदलाव के साथ, Gen Z के लोग अधिक संतुलित जीवनशैली, मानसिक स्वास्थ्य और लचीलापन चाहते हैं।
निहितार्थ और भविष्य की दिशा
कंपनियों के लिए यह एक चेतावनी है: यदि वे अपने कर्मचारियों की नई अपेक्षाओं को नहीं समझते तो टैलेंट की हानि और उत्पादकता में गिरावट का जोखिम बढ़ेगा। कई अग्रणी फर्में पहले ही लचीलापन वाले काम के घंटे, रिमोट वर्क विकल्प और परिणाम‑आधारित मूल्यांकन प्रणाली अपनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं। यह परिवर्तन न केवल कार्यस्थल के माहौल को बदलता है, बल्कि भारत की कुल आर्थिक प्रतिस्पर्धा को भी प्रभावित कर सकता है।
विशेषज्ञों की राय
मानव संसाधन विशेषज्ञ डॉ. रितु बैनर्जी का मानना है कि "एफ़र्ट रेसिशन" को केवल एक अल्पकालिक रुझान नहीं, बल्कि नई कार्य संस्कृति की आधारशिला माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "जब कंपनियां अपने कर्मचारियों को सच्ची स्वायत्तता और विकास के अवसर देती हैं, तभी वे दीर्घकालिक सफलता की राह पर कदम बढ़ा सकती हैं।"