वेस्ट एशिया के युद्ध के बाद $28 अरब की निकासी के बाद, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने जुलाई में $1.6 अरब की शुद्ध खरीदारी की। हालांकि, बाजार में मूलभूत बदलाव नहीं दिख रहा।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- FIIs ने जुलाई के पहले 10 दिनों में $1.6 अरब की शुद्ध खरीदारी की।
- पिछले चार महीनों में $28 अरब का निकास हुआ था, जो पश्चिमी एशिया के युद्ध से प्रेरित था।
- AI‑उन्मुख बाजारों की गिरावट के बाद भी भारत की आकर्षक वैल्यूएशन बनी हुई है, पर जोखिम अभी भी उच्च है।
पश्चिम एशिया में फरवरी के अंत में शुरू हुए संघर्ष ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) को भारतीय इक्विटी बाजार से $28 अरब की भारी निकासी करवायी। इस निकासी के बाद, जुलाई के पहले दस दिनों में FIIs ने फिर से कदम बढ़ाते हुए $1.6 अरब की शुद्ध खरीदारी की, पर यह मात्रा बाजार को पुनर्जीवित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
पिछले चार महीनों की पृष्ठभूमि
फरवरी‑मार्च में वेस्ट एशिया युद्ध के कारण जोखिम‑भरे परिसंपत्ति वर्गों में निवेशकों का भरोसा डगमगा गया। साथ ही, AI‑बूम पर आधारित तकनीकी स्टॉक्स की अत्यधिक कीमतें भी एक चेतावनी बन गईं। इस माहौल में, FIIs ने बड़े पैमाने पर निकासी की, जिससे भारतीय शेयर बाजार में दो‑तीन प्रतिशत की गिरावट देखी गई।
US‑Iran शांति समझौता और उसका प्रभाव
जून 14 को घोषित US‑Iran शांति समझौते ने बाजार में आशावाद लाया। इस समझौते के बाद, जुलाई के पहले आधे में $6.7 अरब की निकासी के बाद, दूसरे आधे में $1.1 अरब की शुद्ध प्रवाह दर्ज किया गया। यह प्रवाह मुख्यतः अमेरिकी और यूरोपीय फंडों से आया, जो भारत को एक सुरक्षित आश्रय के रूप में देख रहे थे।
AI‑बूम के बाद भारत की वैल्यूएशन
Motilal Oswal के विश्लेषकों के अनुसार, भारत की वैल्यूएशन प्रीमियम जून में 18 % तक गिरकर ऐतिहासिक न्यूनतम पर पहुंच गई, जबकि इसका दीर्घकालिक औसत 73 % और 2022 का शिखर 147 % था। इसका मतलब है कि विदेशी निवेशकों के लिए भारत अब कम प्रीमियम पर उपलब्ध है, जिससे दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह की संभावना बढ़ती है।
सरकारी और RBI की नीतियों का अप्रत्यक्ष असर
6 जून को RBI और सरकार ने ऋण बाजार में विदेशी प्रवाह को बढ़ाने के लिए कई कदम उठाए। इन उपायों से विदेशी निवेशकों को भारत की वित्तीय स्थिरता, बेहतर भुगतान संतुलन और रूढ़ि‑स्थिर रुपये का भरोसा मिला। विशेषकर, रूढ़ि स्थिरता विदेशी इक्विटी निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि निरंतर अवमूल्यन डॉलर‑आधारित रिटर्न को घटा देता है।
भविष्य की अनिश्चितताएँ
बाजार की नाजुकता इस बात से स्पष्ट है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की इरान के साथ शांति‑समझौते को समाप्त करने की टिप्पणी के बाद निफ्टी 2 % गिर गई। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान प्रवाह बहुत छोटे हैं, जिससे कोई निर्णायक रुझान निकालना मुश्किल है। Dhananjay Sinha, Systematix Group के CEO, ने कहा, “बाजार अभी भी महँगा है और आय वृद्धि की कोई स्पष्ट राह नहीं दिख रही।”
कुल मिलाकर, FIIs की फिर से प्रवेश की शुरुआत सकारात्मक संकेत देती है, पर भारतीय शेयर बाजार को स्थायी गति पाने के लिए अधिक ठोस आर्थिक डेटा और स्थिर राजनैतिक माहौल की जरूरत है।