हालाँकि महिलाओं की श्रम शक्ति में वृद्धि हुई है, लेकिन अधिकांश ग्रामीण महिलाओं को कम वेतन वाले अनौपचारिक कामों में फंसा देखा जा रहा है, जिससे वे देश की आर्थिक वृद्धि से बाहर रह रही हैं।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- ग्रामीण महिलाओं की रोजगार दर बढ़ी, पर वे कम उत्पादकता वाले कामों में हैं।
- शहरी क्षेत्रों में नौकरी के अवसर सीमित, जिससे महिलाओं का आर्थिक लाभ नहीं हो रहा।
- गुणवत्ता वाले रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की कमी महिलाओं को विकास से बाहर रखती है।
भारत में महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर (LFPR) पिछले कुछ वर्षों में लगातार बढ़ी है, जिसे अक्सर आर्थिक प्रगति का संकेत माना जाता है। लेकिन आंकड़ों की गहरी जाँच से पता चलता है कि यह वृद्धि मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों में कम वेतन और कम उत्पादकता वाले कार्यों में हुई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी लगभग स्थिर है।
शहरी‑ग्रामीण असंतुलन
2022 से 2025 के बीच महिलाओं की LFPR 33.9 % से 40 % तक बढ़ी, जिसमें अधिकांश वृद्धि ग्रामीण महिलाओं द्वारा लाई गई है। ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी 37.5 % से 45.9 % तक बढ़ी, जबकि शहरी महिलाओं की दर 25‑28 % पर स्थिर रही। इस असंतुलन का मुख्य कारण यह है कि नई नौकरियां, वेतन वृद्धि और आर्थिक अवसर मुख्यतः शहरी भारत में उत्पन्न हुए हैं, जबकि महिलाएँ इन अवसरों से लाभ नहीं उठा पा रही हैं।
रोज़गार की गुणवत्ता और आय असमानता
काम करने वाली महिलाओं में से अधिकांश कृषि जैसी कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में स्वयं‑नियोजित हैं। 1.13 करोड़ स्वयं‑नियोजित महिलाओं में से केवल 1 % नियोक्ता हैं, जबकि 44 % वे बिना वेतन के पारिवारिक कार्यकर्ता हैं। परिणामस्वरूप, इन महिलाओं के पास बीमा, पेंशन या भविष्य की सुरक्षा का कोई जाल नहीं है। वेतन के अंतर भी स्पष्ट हैं: सैलरी वाले काम में महिलाओं की औसत आय ₹18,353 है, जो पुरुषों से 24 % कम है; स्वयं‑नियोजित कार्य में अंतर 64 % तक है।
उम्र‑आधारित प्रवेश बाधा
महिलाएँ अक्सर 30 के बाद ही कार्यबल में प्रवेश करती हैं, जब विवाह और बाल देखभाल की जिम्मेदारियां कम हो जाती हैं। इस देर से प्रवेश के कारण, कई महिलाओं को स्नातक के बाद के सबसे उत्पादक आय वाले वर्षों से वंचित होना पड़ता है।
समाधान के मार्ग
उदायती फ़ाउंडेशन के सीईओ पूजा शर्मा गोयल के अनुसार, महिलाओं के लिए अनुकूल माहौल बनाना अत्यावश्यक है। ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों की ओर प्रवास को आसान बनाने के लिए बेहतर परिवहन, childcare सुविधाएं और स्थानीय आर्थिक अवसरों की पहचान आवश्यक है। कृषि में किसान‑उत्पादक संगठनों (FPOs) और सहकारी संरचनाओं के माध्यम से उत्पादकता बढ़ाकर महिलाएँ मूल्य श्रृंखला में ऊपर उठ सकती हैं। उत्तर प्रदेश में किए गए एक पायलट में लॉजिस्टिक्स, रिटेल और फ्लेक्सी‑स्टाफिंग में लगभग 10,000 नौकरियां उपलब्ध थीं, लेकिन अधिकांश महिलाओं को इन अवसरों की जानकारी नहीं थी।
अंततः, केवल बड़ी संख्या में महिलाओं को कार्यबल में लाना पर्याप्त नहीं; गुणवत्ता वाले रोजगार, शहरी रोजगार तक पहुँच, childcare एवं mobility बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और महिलाओं को उत्पादकता की सीढ़ी पर ऊपर ले जाना ही वास्तविक आर्थिक समावेशन की कुंजी है।