तेल की कीमतों में तेज़ी और पश्चिम एशिया के तनाव के कारण सेंसेक्स 561 अंक गिरा। विदेशी फंड आउटफ़्लो और रूपी की 96 सीमा से नीचे गिरावट ने बाजार की भावना को और दबाव में डाल दिया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • तेल के ब्रेंट की कीमत 4.26% बढ़कर $86.85 प्रति बैरल पहुँची
  • रूपी 96.33 तक गिरकर विदेशी मुद्रा बाजार में तनाव बढ़ा
  • बैंक और ऑटो सेक्टर के शेयरों ने मुख्य रूप से गिरावट का कारण बना

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का प्रमुख सूचकांक, सेंसेक्स, 14 जुलाई को 561.46 अंक, यानी 0.72% गिरकर 77,054.94 पर बंद हुआ। यह गिरावट तीन लगातार बढ़त के बाद आई, जब वैश्विक तेल मूल्यों में उछाल और पश्चिम एशिया में फिर से बढ़ते तनाव ने निवेशकों की भावना को प्रभावित किया। उसी दिन नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी 158.95 अंक, यानी 0.66% गिरकर 24,052.05 पर समाप्त हुआ।

पश्चिम एशिया में तनाव और तेल की कीमतों का असर

ब्रेंट क्रूड की कीमतें 4.26% बढ़कर $86.85 प्रति बैरल तक पहुँच गईं, जिससे भारतीय कंपनियों की लागत संरचना पर दबाव बढ़ा। तेल की कीमतों में इस उछाल का सीधा असर आयातित वस्तुओं पर पड़ता है, जिससे महंगाई के दबाव में वृद्धि होती है। इस संदर्भ में, रूपी ने 96.33 का नया न्यूनतम स्तर छू लिया, जिससे विदेशी मुद्रा बाजार में अस्थिरता बढ़ी।

विदेशी फंड आउटफ़्लो और सेक्टरल दबाव

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने 13 जुलाई को लगभग ₹3,062 करोड़ के शेयर बेच दिए, जो बाजार में तरलता की कमी को दर्शाता है। इस प्रवाह ने बैंकिंग और ऑटोमोबाइल सेक्टर को विशेष रूप से नुकसान पहुंचाया। बीएसई में प्रमुख गिरावट वाले शेयरों में HCL टेक (4.42% गिरावट), बजाज फिनसर्व, इंटरग्लोब एविएशन, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, महिंद्रा & महिंद्रा और लार्सन एंड टुब्रो शामिल थे। दूसरी ओर, भारती एयरटेल, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, सन फार्मा और टाटा स्टील जैसे शेयरों ने हल्की उछाल दर्ज की।

वित्तीय एवं आर्थिक पृष्ठभूमि

जून में थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index) 9.87% तक बढ़ गया, जो मई के 9.68% से अधिक है। खाद्य एवं गैर-खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज़ी ने इस इन्फ्लेशन को आगे बढ़ाया। इस बीच, बीएसई मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांक भी क्रमशः 1.01% और 0.55% गिरकर व्यापक बाजार में गिरावट को दर्शाते हैं।

विश्लेषकों की राय और आगे का मार्ग

जियोजिट इन्वेस्टमेंट्स के रिसर्च हेड विनोद नायर ने कहा, "पश्चिम एशिया में तनाव की पुनरावृत्ति ने तेल की कीमतों को तेज़ कर दिया, जिससे भारतीय कंपनियों की कमाई में देरी की संभावना बढ़ी।" साथ ही, रूपी का 96 स्तर से नीचे गिरना आयातित महंगाई को और बढ़ा सकता है। रिलायजे ब्रोकिंग के एसवीपी अजित मिश्रा ने जोड़ा, "भू-राजनीतिक तनाव और मौद्रिक दबाव के बीच निवेशकों की भावना अभी भी नाजुक है, जिससे अगले कुछ सप्ताह में अस्थिरता जारी रहने की संभावना है।"