भारत और यूके के बीच व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA) लागू तो हो गया है, लेकिन निवेश सुरक्षा, पेटेंट नियमों और कार्बन टैक्स जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे अभी भी अनसुलझे हैं।
मुख्य बातें
- CETA ने 99% भारतीय निर्यात पर टैरिफ कम कर दिया है, लेकिन निवेश संधि (BIT) शामिल नहीं है।
- भारत ने 'एवरग्रीनिंग' रोकने के लिए पेटेंट अधिनियम की धारा 3(d) को बरकरार रखा है।
- यूके का कार्बन बॉर्डर टैक्स (CBAM) भारतीय स्टील और एल्युमीनियम निर्यातकों के लिए नई चुनौती बन सकता है।
15 जुलाई, 2026 को भारत-यूके व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता (CETA) लागू होने के साथ ही व्यापारिक बाधाओं में कमी आई है। इस समझौते के तहत 99% भारतीय निर्यात पर लगने वाले शुल्क में कटौती की गई है और पेशेवरों के लिए गतिशीलता के नियमों में ढील दी गई है। हालांकि, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के संकेतों के अनुसार, कई जटिल मुद्दों को भविष्य की बातचीत के लिए छोड़ दिया गया है, जिससे यह समझौता अधूरा महसूस होता है।
निवेश में कमी क्यों?
हालांकि समझौते का नाम 'आर्थिक' है, लेकिन इसमें निवेश के लिए कोई समर्पित अनुभाग नहीं है, जैसा कि भारत के ईएफटीए (EFTA) और न्यूजीलैंड के साथ हुए समझौतों में देखा गया है। मुख्य विवाद द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) और विवाद समाधान (Arbitration) की प्रक्रिया को लेकर है। भारत ने 2017 में अपनी पुरानी संधियों को रद्द कर दिया था ताकि विवादों का निपटारा पहले भारतीय कानूनी प्रणाली के माध्यम से हो सके, जबकि विदेशी निवेशक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता चाहते हैं।
बौद्धिक संपदा और दवा उद्योग का संघर्ष
यूके की दवा कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में प्रवेश करना अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। भारत ने पेटेंट अधिनियम, 1970 की धारा 3(d) को मजबूती से बरकरार रखा है। यह प्रावधान दवाओं की 'एवरग्रीनिंग' (मामूली बदलाव करके पेटेंट अवधि बढ़ाना) को रोकता है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारतीय जेनेरिक दवा निर्माता प्रतिस्पर्धी कीमतों पर दवाएं उपलब्ध कराते रहेंगे, जिससे यूके के फार्मा निर्यातकों को कड़ी चुनौती मिलेगी।
क्यों यह महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि व्यापार समझौते केवल टैरिफ कम करने के बारे में नहीं हैं, बल्कि वे नियमों और सुरक्षा उपायों के बीच का संतुलन हैं। निवेश सुरक्षा की कमी और कार्बन टैक्स जैसे नए अवरोध इस समझौते की दीर्घकालिक सफलता को प्रभावित कर सकते हैं।
निवेश सुरक्षा और बौद्धिक संपदा पर समझौता न होना, भविष्य के व्यापारिक संबंधों में अनिश्चितता पैदा कर सकता है।
अंत में, यूके का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है। जनवरी 2027 से लागू होने वाला यह नियम कार्बन-गहन उत्पादों जैसे स्टील और एल्युमीनियम पर अतिरिक्त शुल्क लगाएगा, जो CETA के तहत मिलने वाले टैरिफ लाभ को खत्म कर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. CETA का भारतीय निर्यातकों पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
इससे 99% भारतीय निर्यात पर टैरिफ कम होगा, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
2. कार्बन टैक्स (CBAM) क्या है?
यह यूके द्वारा कार्बन-गहन उत्पादों के आयात पर लगाया जाने वाला एक शुल्क है जो पर्यावरण संरक्षण के लिए है।