जून 2026 में आयोजित विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट परीक्षा (FMGE) में कुल 36,280 उम्मीदवारों में से केवल 4,635 ही पास हुए – यानी केवल 12.78 %। तमिलनाडु मेडिकल स्टूडेंट्स एसोसिएशन‑FMG ने कठिन प्रश्नपत्र और असमान मानक को लेकर आधिकारिक जांच की माँग की है।

विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट (FMG) परीक्षा का परिणाम तमिलनाडु मेडिकल स्टूडेंट्स एसोसिएशन‑फ़ॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स (TNMSA FMG) शाखा के लिए एक बड़ा झटका बन गया है। राष्ट्रीय बोर्ड ऑफ़ एग्ज़ामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज़ (NBEMS) ने 7 जुलाई को प्रकाशित आँकड़े दर्शाते हैं कि 37,428 पंजीकृत अभ्यर्थियों में से 36,280 ने परीक्षा दी, परन्तु केवल 4,635 ने पास अंक 150 हासिल किए। यह 12.78 % का पास प्रतिशत है, अर्थात् हर आठ में से केवल एक ही सफल रहा।

परीक्षा का स्वरूप और नई चुनौतियाँ

TNMSA FMG के राज्य सचिव S. वसंत फ़िलिप अबिशाक के अनुसार, परीक्षा को अभ्यर्थियों ने “अत्यंत कठिन” और “मानसिक रूप से थकाऊ” बताया। पेपर‑1 को तुलनात्मक रूप से संतुलित माना गया, परन्तु पेपर‑2 में पहली बार क्लिनिकल सीनारियो‑आधारित, इमेज‑आधारित तथा वीडियो‑आधारित प्रश्नों की भरमार थी। इससे समय‑प्रबंधन में गंभीर बाधा उत्पन्न हुई और कई उम्मीदवार समय सीमा के भीतर सभी प्रश्न हल नहीं कर सके।

आंकड़ों की झलक

परीक्षा में पास अंक 150 निर्धारित है। आँकड़े बताते हैं कि 327 उम्मीदवारों ने ठीक 149 अंक हासिल कर एक अंक से बाहर रह गए। कुल 1,022 ने 147‑149 अंक के बीच स्कोर किया, 4,157 ने 140‑149 अंक के बीच, और 9,905 ने 130‑149 अंक के बीच। इस बड़ी संख्या में ‘एक अंक की कमी’ को देखते हुए, छात्र संघ ने परीक्षण की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।

इतिहास के साथ तुलना

पिछले दो सत्रों में पास प्रतिशत अधिक रहा – जून 2025 में 18.6 % और दिसंबर 2025 में 23.9 %। यह गिरावट न केवल छात्रों के मनोबल को धूमिल करती है, बल्कि विदेशी मेडिकल स्नातकों के भारत में प्रवेश को भी प्रभावित कर सकती है।

संघ की माँगें और संभावित नीतिगत बदलाव

TNMSA FMG ने NBEMS तथा राष्ट्रीय मेडिकल कमिशन (NMC) से व्यापक पुनरावलोकन की माँग की है। इसमें प्रश्नों की लंबाई, क्लिनिकल जटिलता, इमेज/वीडियो‑आधारित स्वरूप, तथा समय सीमा की उपयुक्तता की जाँच शामिल है। संघ ने नए प्रश्नपत्र स्वरूप की पेशकश से पहले स्पष्ट सूचना देने की भी मांग की और इस विशेष सत्र के लिए पास अंक को एक बार के अपवाद के रूप में घटाने का प्रस्ताव रखा।

भविष्य की दिशा

यदि ये माँगें पूरी नहीं हुईं, तो विदेशी मेडिकल स्नातकों के भारत में प्रवेश की प्रक्रिया और जटिल हो सकती है, जिससे स्वास्थ्य प्रणाली में संभावित कार्यबल की कमी का जोखिम बढ़ेगा। इस संदर्भ में, नीति निर्माताओं को परीक्षा की कठोरता और उम्मीदवारों की तैयारी के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।