एनडीए‑शासित राज्यों ने विकसित भारत शिक्षा संस्थान (VBSA) बिल पर आपत्ति जताई है, क्योंकि यह उच्च शिक्षा नियमन को एक ही निकाय में समेट कर राज्य की स्वायत्तता को कमजोर कर सकता है। बिल के प्रमुख प्रावधानों को केंद्र के अत्यधिक नियंत्रण के रूप में देख कर कई विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों ने भी विरोध किया है।
विकसित भारत शिक्षा संस्थान (VBSA) बिल, 2025, भारत के उच्च शिक्षा नियमन को एक नई संरचना में बदलने का प्रयास करता है। इस विधेयक के तहत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) और राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) को समाप्त कर एक एकीकृत शीर्ष निकाय – VBSA – स्थापित किया जाएगा। यह प्रस्ताव संसद के संयुक्त समिति द्वारा presently समीक्षा में है, जिसका नेतृत्व भाजपा सांसद डी. पुरंदेस्वरी कर रही हैं।
पृष्ठभूमि और विधेयक की मुख्य धाराएँ
भारत में पिछले दो दशकों से उच्च शिक्षा क्षेत्र में कई चुनौतियों का सामना किया गया है – नियामक संस्थाओं के बीच अधिकारों का ओवरलैप, मानकों में असंगति, और संस्थानों की स्वायत्तता पर अनिश्चितता। सरकार ने इन समस्याओं को हल करने के लिए VBSA बिल को एक ‘समाधान’ के रूप में पेश किया, परन्तु धारा 45 और 47 को अत्यधिक केंद्रीकरण का जोखिम माना जा रहा है। धारा 45 के तहत केंद्र को VBSA आयोग और उसके परामर्श परिषदों को बाध्यकारी दिशा‑निर्देश जारी करने की शक्ति मिलती है, जबकि धारा 47 में आपातकालीन स्थिति में केंद्र को छह महीने तक आयोग को निलंबित या अधीनस्थ करने की अनुमति देता है, जिसे और छह महीने तक बढ़ाया जा सकता है।
राज्य सरकारों और विश्वविद्यालयों की प्रतिक्रिया
आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और मेघालय सहित कई एनडीए‑शासित राज्य इस विधेयक को ‘राज्य स्वायत्तता के लिए खतरा’ कहते हुए विरोध कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि नियामक संरचना में केवल एक ही राज्य या केंद्र शासित प्रदेश का नामांकन (रोटेशन के आधार पर) ही नियामक और मानक परिषदों में है, जिससे बहु‑राज्य प्रतिनिधित्व का अभाव स्पष्ट होता है। बाणास हिन्दू विश्वविद्यालय, तेलंगाना की विपक्षी सरकार, तथा कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों ने भी इस बात पर जोर दिया कि अध्यक्षता और सदस्य चयन प्रक्रिया में केंद्र के नामांकन का बहुमत, पारदर्शिता और स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
संभावित प्रभाव और भविष्य की दिशा
यदि यह बिल पारित हो जाता है, तो भारतीय उच्च शिक्षा का नियामक ढाँचा एक ही इकाई में समेकित हो जाएगा, जिससे नीतियों का एकरूप कार्यान्वयन संभव हो सकता है, परन्तु साथ ही राज्य‑स्तर के विविध शैक्षणिक आवश्यकताओं को अनदेखा किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक केंद्रीकरण से नवाचार, क्षेत्रीय विशेषताओं और सामाजिक समावेशी पहलुओं पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसके अलावा, मौजूदा संस्थाओं के विघटन की प्रक्रिया में अनिश्चितता और संक्रमणकालीन व्यवधान की संभावना भी उभरती है।
आगे क्या हो सकता है?
संयुक्त संसद समिति अभी भी बिल की कई धारणाओं पर संशोधन की मांग कर रही है। राज्य प्रतिनिधियों ने प्रतिनिधित्व को बढ़ाने, आपातकालीन शक्ति को सीमित करने और चयन प्रक्रिया में बहु‑स्तरीय भागीदारी को अनिवार्य करने के प्रस्ताव रखे हैं। इस बीच, शैक्षणिक समुदाय और नागरिक समाज भी इस विधेयक के संभावित परिणामों पर विस्तृत चर्चा कर रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि भारत की उच्च शिक्षा नीति का भविष्य इस बड़े विमर्श पर निर्भर करेगा।