कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्कूल प्रमुख, सहायक प्रमुख और बाल कल्याण अधिकारी के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि पीओसीएसओ अधिनियम के तहत बच्चों के यौन शोषण की रिपोर्टिंग में कोई विवेक नहीं है, और इस दायित्व का उल्लंघन गंभीर अपराध माना गया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कर्नाटक हाई कोर्ट ने FIR को नहीं रद्द किया
- स्कूल के प्रमुख और बाल कल्याण अधिकारी पर पीओसीएसओ एक्ट के तहत दंडित किया गया
- बच्चों के यौन अपराध की रिपोर्टिंग में कोई छूट नहीं है
बेंगलुरु स्थित कर्नाटक हाई कोर्ट ने उडुपी जिले के एक हाई स्कूल के प्रमुख, सहायक प्रमुख/वॉर्डन और बाल कल्याण अधिकारी के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी। इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया कि Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act के तहत बच्चों के यौन शोषण की रिपोर्टिंग अनिवार्य है और इसे टाल‑मटोल या बदलने का कोई अधिकार नहीं है।
पृष्ठभूमि
जून 2, 2026 को स्कूल के हॉस्टल में एक कक्षा‑10 छात्र ने अपने कमरे के साथी के साथ हुए यौन अत्याचार की शिकायत की। शिकार ने तुरंत वॉर्डन को बताया, परन्तु अधिकारियों ने पुलिस को रिपोर्ट करने के बजाय मूल शिकायत को नष्ट करके एक नई बयान तैयार करने को कहा, जिसमें घटना को “सहमति‑से‑भरी” बताया गया। यह शिकायत अंततः शिकार के पिता के माध्यम से दर्ज हुई, जिन्होंने आरोप लगाया कि बाल कल्याण अधिकारी ने मूल शिकायत को नष्ट कर दिया और बच्चे को “सहमति‑से‑भरी” घटना के रूप में प्रस्तुत करने के लिए दबाव डाला।
पीओसीएसओ अधिनियम की प्रावधान
पीओसीएसओ अधिनियम के सेक्शन 19 और 21 के तहत, किसी भी बाल यौन अपराध की रिपोर्टिंग न करने पर दंडित किया जा सकता है। सेक्शन 21 में यह कहा गया है कि रिपोर्ट न करने पर एक साल तक की जेल या जुर्माना हो सकता है, जबकि सेक्शन 19 में अपराधी को सीधे दण्डित किया जाता है। कोर्ट ने कहा, “रिपोर्टिंग का दायित्व त्वरित, निरपेक्ष और बिना किसी विवेक के है।” यह प्रावधान संस्थानों को अपने सार्वजनिक छवि की रक्षा के नाम पर न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने से रोकता है।
न्यायालय का विश्लेषण
जस्टिस M. नागाप्रसन्ना ने कहा कि “अपराध की गंभीरता केवल दंड के स्तर से नहीं, बल्कि दायित्व की पवित्रता से मापी जाती है।” उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि “सेक्शन 19 और 21 केवल सजावटी प्रावधान नहीं हैं; वे बच्चे के अधिकारों की सुरक्षा के लिए विधायी ढांचे की रीढ़ हैं।” इस प्रकार, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि भविष्य में ऐसी कोई भी चुप्पी या छुपाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
भविष्य की संभावनाएँ
यह फैसला कर्नाटक राज्य में स्कूलों और अन्य संस्थानों के लिए एक चेतावनी है कि वे पीओसीएसओ अधिनियम के तहत अपने दायित्वों को गंभीरता से लें। यदि आगे की जांच में अतिरिक्त अपराध सिद्ध होते हैं, तो दोषियों को और कठोर सजा का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही, यह निर्णय राष्ट्रीय स्तर पर बाल अधिकारों की सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।