लोकसभा के विरोध नेता राहुल गांधी ने शिक्षा क्षेत्र में बढ़ते भ्रष्टाचार को ‘धोखेबाज़ी की मशीन’ कहा और मोदी सरकार व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की चुप्पी को निंद्य बताया। उन्होंने 17 जुलाई को देहरादून में ‘छात्रों की गूँज’ रैलियों के माध्यम से एक क्रांति का आह्वान किया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • राहुल गांधी ने शिक्षा में भ्रष्टाचार को ‘धोखेबाज़ी की मशीन’ कहा।
  • मोदी सरकार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की चुप्पी को उन्होंने निंद्य किया।
  • देहरादून में 17 जुलाई को ‘छात्रों की गूँज’ रैली के साथ शिक्षा में क्रांति का आह्वान किया।

लोकसभा के विपक्षी नेता राहुल गांधी ने 13 जुलाई को अपने ‘छात्रों की गूँज’ पहल के दूसरे चरण के दौरान भारत के शिक्षा तंत्र को “धोखेबाज़ी, अनैतिक, पक्षपाती और भ्रष्ट” शब्दों से परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि यह प्रणाली अब छात्रों और उनके परिवारों को कर्ज, तनाव और निराशा की ओर धकेल रही है।

भ्रष्टाचार की गहराई

गांधी ने विशेष रूप से “पेपर लीक माफिया” को निशाना बनाते हुए कहा कि यह नेटवर्क लाखों मेहनती छात्रों के वर्षों की मेहनत को एक ही झटके में छीन लेता है। इस माफिया के पीछे गुप्त विक्रेताओं और सरकारी अधिकारियों का गठजोड़ है, जो टेंडर और पदोन्नति प्राप्त करते हैं, जबकि असली पीड़ित छात्र होते हैं।

सरकारी चुप्पी और मीडिया की भूमिका

रिपोर्ट में यह भी उजागर किया गया कि मोदी सरकार और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस समस्या को नजरअंदाज कर रहे हैं। गांधी ने कहा, “वे जिम्मेदारी से आँखें मोड़ रहे हैं, जबकि मीडिया भी इस मुद्दे पर लम्बी चुप्पी बनाए रखी है।” यह आरोप भारतीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों—जवाबदेही और पारदर्शिता—के विरुद्ध है।

क्रांति का आह्वान

गांधी ने छात्रों को 17 जुलाई को देहरादून में एकत्रित होने का आग्रह किया, जहाँ ‘छात्रों की गूँज’ रैली को और अधिक आवाज़ दी जाएगी। उन्होंने कहा, “अब समय आ गया है कि हम इस प्रणाली को बदलें, एक ऐसी शिक्षा प्रणाली बनाएं जो सपनों को पोषित करे, न कि उन्हें कुचल दे।”

भविष्य की दिशा

कांग्रेस ने इस अवसर पर एक विस्तृत शिक्षा सुधार चार्टर पेश करने का वादा किया है, जिसमें परीक्षा प्रणाली, प्रवेश प्रक्रिया और वित्तीय बोझ को घटाने के उपाय शामिल हैं। यदि यह पहल सफल होती है, तो यह भारत की युवा पीढ़ी के भविष्य को पुनः आकार दे सकती है।

भ्रष्टाचार‑प्रेरित शिक्षा प्रणाली के खिलाफ यह आंदोलन न केवल एक राजनीतिक बयान है, बल्कि भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए एक निर्णायक मोड़ भी हो सकता है।