केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर त्रि-भाषा फॉर्मूले को लागू करने के लिए एक व्यावहारिक योजना पेश की है। बोर्ड शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए सेवानिवृत्त शिक्षकों और योग्य स्नातकोत्तर (PG) उम्मीदवारों की सेवाएं लेने पर विचार कर रहा है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- CBSE शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए सेवानिवृत्त शिक्षकों और योग्य स्नातकोत्तरों की मदद लेगा।
- लगभग 47.3% CBSE स्कूलों में पहले से ही दो या दो से अधिक भारतीय भाषाएं पढ़ाई जा रही हैं।
- तीसरी भाषा (R3) का मूल्यांकन स्कूल स्तर पर होगा और इसके कारण किसी छात्र को फेल नहीं किया जाएगा।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 से संबद्ध स्कूलों में त्रि-भाषा नीति को लागू करने के लिए संसाधनों की कमी से निपटने का एक व्यावहारिक मार्ग खोज लिया है। बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि इस नीति को सुचारू रूप से लागू करने के लिए सेवानिवृत्त शिक्षकों और "उपयुक्त रूप से योग्य स्नातकोत्तर" (Postgraduates) उम्मीदवारों की मदद ली जा सकती है।
शिक्षकों की कमी को दूर करने की व्यावहारिक रणनीति
बोर्ड ने अदालत में दायर अपने हलफनामे में स्पष्ट किया कि वह शिक्षकों की उपलब्धता और शिक्षण संसाधनों की कमी को दूर करने के लिए एक बेहद लचीला रुख अपना रहा है। अंतरिम उपाय के रूप में, स्कूल अपनी शिक्षण क्षमता को मजबूत करने के लिए वर्तमान शिक्षकों, सेवानिवृत्त शिक्षकों और योग्य स्नातकोत्तरों को नियुक्त कर सकते हैं। इसके अलावा, वर्चुअल या हाइब्रिड शिक्षण और सहोदय स्कूल समूहों (Sahodaya clusters) का भी उपयोग किया जाएगा ताकि सुदूर क्षेत्रों में भी भाषाओं की शिक्षा सुलभ हो सके।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और बोर्ड का पक्ष
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ इस संबंध में दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। याचिकाकर्ताओं ने कक्षा 9 में अचानक नई भाषा थोपे जाने और उसके आंतरिक मूल्यांकन को अनिवार्य बनाने पर चिंता जताई थी। छात्रों और अभिभावकों का तर्क है कि इससे बोर्ड परीक्षा के ठीक पहले छात्रों पर मानसिक दबाव बढ़ेगा। इसके विपरीत, बोर्ड का कहना है कि यह नीति राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCFSE-2023) के सिद्धांतों के अनुरूप है, जो बहुभाषावाद को बढ़ावा देती है।
आंकड़े और NCERT की तैयारी
इस चिंता पर जवाब देते हुए CBSE ने बताया कि कक्षा 9 के छात्रों को प्रायोजित करने वाले 28,848 स्कूलों में से 47.3% पहले से ही दो या अधिक भारतीय भाषाएं सिखा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, 99.9% स्कूलों में कम से कम एक भारतीय भाषा का शिक्षक पहले से मौजूद है। वहीं, NCERT ने भी 22 अनुसूचित भाषाओं में पाठ्यपुस्तकें तैयार करने की प्रक्रिया तेज कर दी है। हिंदी, संस्कृत, मराठी और उर्दू जैसी भाषाओं की पाठ्यसामग्री पहले ही वेबसाइट पर अपलोड कर दी गई है।
मूल्यांकन प्रक्रिया और छात्रों को राहत
बोर्ड ने यह भी साफ किया कि तीसरी भाषा (R3) का उद्देश्य केवल बुनियादी संचार कौशल विकसित करना है, न कि साहित्यिक विशेषज्ञता। यदि कोई छात्र कक्षा 9 के मूल्यांकन में असफल रहता है, तो उसे रोका नहीं जाएगा। उसे कक्षा 10 में पढ़ाई के दौरान इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने का अवसर दिया जाएगा। बोर्ड ने आश्वासन दिया है कि इस नीति के कारण किसी भी छात्र का शैक्षणिक वर्ष प्रभावित नहीं होगा और न ही उन्हें किसी प्रकार की हानि होगी।