सुखबीर बडाल ने बताया कि फिल्म 'सतलुज' सिख इतिहास के कड़वे दौर को उजागर करती है, जिसमें कांग्रेस की सेना द्वारा सच्चखंड श्री हरमंदिर साहिब पर हमले और हजारों निर्दोष सिख युवाओं की जलती मौतें शामिल हैं। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन से प्रेरित है।
पंजाब के प्रमुख राजनीतिक आंकड़े सुखबीर बडाल ने हाल ही में फिल्म सतलुज के बारे में अपने विचार प्रकट किए। बडाल ने कहा कि यह फिल्म उस दर्दनाक अवधि की सच्ची कहानी को दर्शाती है, जब कांग्रेस पार्टी ने साचखण्ड श्री हरमंदिर साहिब पर सैन्य हमले किए और हजारों बेगुनाह सिख युवाओं को जलाकर मार दिया।
जसवंत सिंह खालरा: मानवाधिकार के प्रतीक
‘सतलुज’ का मूल प्रेरणा स्रोत मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा हैं, जिन्होंने 1990 के दशक में पंजाब में ग़ैरक़ानूनी ग़ुमशुदगी के मामलों की जाँच की और कई गहरी साजिशों को उजागर किया। उनकी हत्या 1995 में की गई थी, परन्तु उनका कार्य आज भी कई लोगों को प्रेरित करता है। फिल्म निर्माता ने खालरा की जीवनी को आधार बनाकर सामाजिक अन्याय, बलपूर्वक जाब्ती और न्याय के संघर्ष को सिनेमाई रूप दिया है।
1992 का साचखण्ड हमला: इतिहास का कड़वा अध्याय
1992 में कांग्रेस‑समर्थित सेना ने साचखण्ड श्री हरमंदिर साहिब पर सैन्य कार्रवाई की, जिससे कई सिख युवा मारे गए। यह घटना सिख समुदाय के भीतर गहरी जड़ें जमा चुकी हिंसा और दमन का प्रतीक बन गई। बडाल ने इस घटना को ‘अमानवीय यातना’ के रूप में वर्णित किया और कहा कि ‘सतलुज’ इन कड़वे तथ्यों को फिर से जीवंत करती है।
फिल्म की सामाजिक और राजनीतिक महत्ता
‘सतलुज’ केवल एक सिनेमाई प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज़ है। यह दर्शकों को सिख इतिहास, मानवाधिकार उल्लंघन और सामुदायिक एकता के मुद्दों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है। बडाल ने कहा कि फिल्म को व्यापक दर्शकों तक पहुँचाना आवश्यक है, क्योंकि यह पीढ़ी‑दर‑पीढ़ी अनसुने रह गए दर्द को उजागर करती है।
भविष्य की राह और अपेक्षित प्रभाव
बडाल ने आशा जताई कि ‘सतलुज’ स्क्रीनिंग के बाद न्याय के लिए नई आवाज़ें उठेंगी और सरकार को सच्चाई के सामने खड़े होने के लिए मजबूर किया जाएगा। इस प्रकार, फिल्म न केवल साक्षी बनती है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की दिशा में एक प्रेरक शक्ति भी बनती है।