तीरुपति नगर निगम और टिरुपति शहरी विकास प्राधिकरण ने 23 जलाशयों के नवीनीकरण और जल‑प्रबंधन को सुदृढ़ करने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने का कदम उठाया है। यह एकीकृत जल‑प्रबंधन मॉडल शहर को जल‑संकट और बाढ़ से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

तीरुपति – ‘सिटी ऑफ़ टैंक्स एंड लेक्स’ योजना अब विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) चरण में प्रवेश कर चुकी है। राज्य के मुख्य मंत्री नारा चंद्रबाबू नायडु के प्रमुख प्रोजेक्ट के तहत, तिरुपति नगर निगम (TMC) और तिरुपति शहरी विकास प्राधिकरण (TUDA) ने 23 प्रमुख जलाशयों को पुनर्जीवित करने और बाढ़‑रोधी बुनियादी ढाँचा मजबूत करने के लिए एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मौजूदा चुनौतियाँ

तीरुपति का जल‑परिदृश्य परंपरागत रूप से तालाब, जल‑संग्रहण टैंक्स, जल‑स्रोत चैनल और प्राकृतिक जल‑निकासी मार्गों के जटिल नेटवर्क से जुड़ा रहा है, जो बाढ़‑नियंत्रण, भू‑जल पुनर्भरण और पारिस्थितिक संतुलन को सुनिश्चित करता था। लेकिन तेज़ शहरीकरण, तालाबों में सिल्टेशन, जल‑स्रोतों का क्षीणन, प्राकृतिक नालों का अवरोध और अनधिकृत अतिक्रमण ने इस प्राकृतिक प्रणाली को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया है।

एकीकृत जल‑प्रबंधन की रूपरेखा

TUDA द्वारा आयोजित पैनल चर्चा में, TMC कमिश्नर सरदा देवी ने ‘क्लाइमेट‑रेज़िलिएंट इंटीग्रेटेड वाटर मैनेजमेंट’ नामक अवधारणा‑नोट प्रस्तुत किया। इस दस्तावेज़ में जल‑स्रोतों के आपसी जुड़ाव को पुनर्स्थापित करने, जल‑गुज़रने वाले मार्गों को साफ़ करने और जल‑गुज़राव को वैज्ञानिक रूप से नियोजित करने की योजना है।

विस्तृत DPR और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सहयोग

TUDA के सचिव एन. वी. श्रीकांत बाबू ने बताया कि 23 चयनित जलाशयों को पुनर्जीवित करने और बाढ़‑प्रबंधन बुनियादी ढाँचे को सुदृढ़ करने के लिए एक व्यापक DPR तैयार किया जाएगा। इस रिपोर्ट को जर्मनी के KfW विकास बैंक को प्रस्तुत किया जाएगा, जबकि तकनीकी सहायता ICLEI (इंटरनेशनल सिटी‑लेड इको‑इनोवेशन) से प्राप्त होगी। प्रमुख जलविज्ञानी राममोहन राव की टीम इस प्रक्रिया में प्रमुख वैज्ञानिक मार्गदर्शन दे रही है।

भविष्य की संभावनाएँ और सामाजिक‑पर्यावरणीय प्रभाव

यदि प्रस्तावित जल‑जाल को वैज्ञानिक रूप से पुनर्स्थापित किया गया, तो तिरुपति के भविष्य में बाढ़‑जोखिम घटेगा, जल‑संकट में कमी आएगी और स्थानीय कृषि तथा पर्यटन को नई ऊर्जा मिलेगी। यह मॉडल अन्य जल‑संकटग्रस्त भारतीय शहरों के लिए एक आदर्श रूपरेखा बन सकता है, जिससे राष्ट्रीय जल‑सुरक्षा नीति में भी बदलाव की संभावना है।