भारत में ई20 पेट्रोल के लिए इथेनॉल मिश्रण को लेकर उठाए गए आँकड़े अक्सर वास्तविकता से दूर होते हैं। यह लेख चार प्रमुख दावों को तोड़‑फोड़ कर नीति, किसानों और पर्यावरण पर वास्तविक प्रभाव उजागर करता है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- इथेनॉल मिश्रण से विदेशी मुद्रा बचत के दावे अक्सर इनपुट लागत को नज़रअंदाज़ करते हैं।
- किसानों के लिए मूल्य‑वोलैटिलिटी ने अनजाने में आय में गिरावट और आयात को बढ़ावा दिया।
- पर्यावरणीय लाभों की गणना में संपूर्ण जीवन‑चक्र विश्लेषण की कमी है।
भारत के पेट्रोलियम मंत्री हारदीप सिंह पुरी और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इथेनॉल ब्लेंडिंग को स्वच्छ ऊर्जा के स्तंभ के रूप में पेश किया है। परंतु, इस नीति के पीछे के आँकड़े अक्सर टकटकी से देखे जाने वाले भ्रमों का शिकार होते हैं। इस लेख में चार प्रमुख दावों—विदेशी मुद्रा बचत, किसान‑आय, पर्यावरणीय लाभ और ई20 की सुरक्षा—की गहराई से जांच की गई है।
विदेशी मुद्रा बचत का मिथक
पेट्रोलियम मंत्रालय का दावा है कि 2014 से इथेनॉल मिश्रण ने लगभग ₹1.4 लाख करोड़ विदेशी मुद्रा बचाई है। वास्तविकता में, इथेनॉल उत्पादन के लिए आवश्यक मक्का और गन्ने की खेती के लिए उर्वरक (यूरेया और डीएपी) आयातित प्राकृतिक गैस से बनते हैं। साथ ही, एथेनॉल को डिस्टिल करने के लिए ऊर्जा की भी आवश्यकता होती है, जो अक्सर कोयला या आयातित पेट्रोलियम से आती है। इस चक्र में, हम तेल आयात करके वही तेल घटक का उत्पादन कर रहे हैं, जो ऊर्जा‑सुरक्षा की बात को उलट देता है।
किसानों की आय पर प्रभाव
इथेनॉल की माँग ने मक्का की कीमत को ₹14,500 से बढ़ाकर ₹24,500 प्रति टन कर दिया। प्रारंभिक रूप से किसानों को लाभ हुआ, परन्तु इस कीमत‑उछाल ने पोल्ट्री उद्योग को प्रभावित किया, जिससे अंडे की कीमत बढ़ी। अंततः अधिक उत्पादन के कारण कीमतें गिर गईं और भारत को शुद्ध मक्का आयातकर्ता बनना पड़ा। इस स्थिति में, “किसानों की आय दुगनी हुई” का दावा वास्तविक आर्थिक नुकसान को छुपाता है।
पर्यावरणीय दावे की वास्तविकता
सरकार का कहना है कि इथेनॉल मिश्रण ने 6.98 लाख टन CO₂ की कमी की है। जबकि टेल‑पाइप उत्सर्जन में कमी संभव है, जीवन‑चक्र विश्लेषण में ट्रैक्टर‑डीज़ल, उर्वरक उत्पादन, तथा परिवहन के उत्सर्जन को अक्सर अनदेखा किया जाता है। एक लीटर गन्ने के इथेनॉल को तैयार करने में लगभग 3,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, और यह अक्सर जल‑संकटग्रस्त मराठवाड़ा में किया जाता है। इस प्रकार, पर्यावरणीय लाभ को सही‑तरीके से आंका जाना आवश्यक है।
ई20 का सुरक्षा दावा
ई20 मिश्रण में पेट्रोल की तुलना में दो‑तिहाई ऊर्जा होती है, जिससे हर लीटर में चलने वाली दूरी घटती है। पुराने 20 करोड़ वाहन, जिन्हें ई20 के लिए नहीं बनाया गया, अब कम माइलेज का सामना कर रहे हैं, जबकि उपभोक्ता को कोई मूल्य‑छूट नहीं मिलती। इस “सुरक्षा” के पीछे गणितीय असंगति है, न कि तकनीकी असुरक्षा।
सारांश में, इथेनॉल नीति के पीछे के आँकड़े अक्सर सतही दिखते हैं, परन्तु विस्तृत विश्लेषण में आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय लागतें स्पष्ट रूप से उभरती हैं। नीति निर्माताओं को इन जटिलताओं को समझते हुए अधिक पारदर्शी और डेटा‑आधारित निर्णय लेने चाहिए।