दक्षिण भारत की अनाज भंडार के रूप में जानी जाने वाली तमिलनाडु डेल्टा, कमजोर दक्षिण-पश्चिमी मानसून और कावेरी जल विवाद के कारण गंभीर कृषि संकट का सामना कर रही है। कुरुवै खेती के क्षेत्र में इस साल 89,000 एकड़ तक गिरावट आई है, जबकि पिछले साल 1.94 लाख एकड़ थे।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कावेरी जल के कम प्रवाह से डेल्टा में पधान की फसल घट गई।
- कमज़ोर दक्षिण‑पश्चिमी मानसून ने जल‑भंडार को खाली कर दिया।
- फसल नुकसान से किसान आय में भारी घट और ग्रामीण रोजगार में संकट।
तमिलनाडु के कोर डेल्टा, जिसे अक्सर ‘दक्षिण भारत का अनाज भंडार’ कहा जाता है, इस साल एक गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। दक्षिण‑पश्चिमी मानसून की कम वर्षा और कावेरी जल विवाद के कारण, कई हजार एकड़ धान के खेत सूखे पड़े हैं, जिससे किसान आर्थिक रूप से असहाय हो रहे हैं।
पृष्ठभूमि और जल‑विवाद
कावेरी नदी का जल वितरण राज्य‑स्तरीय विवाद कई दशकों से चल रहा है। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच न्यायालय‑निर्धारित जल‑सहयोग के बावजूद, जून 2026 में मात्र 2.915 tmc ft जल प्राप्त हुआ, जबकि न्यूनतम 9.19 tmc ft की आवश्यकता थी। इस अंतर ने मेट्टुर जलाशय के जल‑स्तर को घटा दिया, जिससे 12 जून को नियत जल‑मुक्ति नहीं हो सकी।
कुरुवै (खरिफ़) फसल पर प्रभाव
कुर्वै फसल के लिए तमिलनाडु सरकार ने 3.55 लाख एकड़ में भूजल के माध्यम से बीज बोने की योजना बनाई थी, परंतु वास्तविकता में केवल 1.5 लाख एकड़ ही मुख्य डेल्टा जिलों—थंजावुर और तिरुवरूर—में कवर हो पाए। थंजावुर में 89,000 एकड़ और तिरुवरूर में 64,000 एकड़ तक फसल का क्षेत्र घट गया, जबकि पिछले साल क्रमशः 1.94 लाख और 1.91 लाख एकड़ था।
किसानों की कठिनाइयाँ
भूजल पर निर्भर किसान अस्थिर विद्युत‑आपूर्ति, गिरती जल‑स्तर और बोरवेल जल की घटती गुणवत्ता से जूझ रहे हैं। कई किसानों ने कहा कि तीन‑फ़ेज़ बिजली की अनियमित आपूर्ति से पधान की वृद्धि में बाधा आई। अतिरिक्त रूप से, जल‑रिलीज़ की आशा में दो बार ग्रीष्मकालीन हल चलाने के बाद, अब फसल न उग पाने के कारण श्रमिक बेरोजगार हो गए हैं।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव
कावेरी इर्रिगेशन फार्मर्स वेलफ़ेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष महाधनापुरम् राजाराम का अनुमान है कि डेल्टा किसानों को लगभग ₹1,125 करोड़ का नुकसान होगा। इससे न केवल धान की उत्पादन में 15 लाख टन तक की कमी होगी, बल्कि पशुधन की चारा की कमी और श्रमिकों का प्रवास भी बढ़ेगा। कई किसान राज्य से ‘सूखा‑घोषणा’ की मांग कर रहे हैं, ताकि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत ‘रोके गए बोआई/बुआई जोखिम’ के तहत मुआवजा मिल सके।
भविष्य में यदि साम्बा या थलादी फसल पर भी समान जल‑संकट आए तो राज्य पर आर्थिक दबाव और बढ़ेगा, जिससे ग्रामीण विकास की राह में नई चुनौतियां उत्पन्न होंगी।