हैदराबाद स्थित नेचुरल डाई प्रोसेसिंग एंड इनक्यूबेशन सेंटर (NDPIC) बायो-डीग्रेडेबल पेंट और इको-फ्रेंडली होली के रंग विकसित कर त्योहारों के प्रदूषण को कम करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है। प्राकृतिक स्रोतों से बने ये रंग भारी धातुओं से मुक्त हैं और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करते हैं।

मुख्य बिंदु

  • NDPIC सैपन की लकड़ी जैसे प्राकृतिक स्रोतों से प्रतिदिन 2 टन बायो-डीग्रेडेबल पेंट का उत्पादन कर रहा है।
  • सिंथेटिक रंगों में सीसा, पारा और कैडमियम जैसी जहरीली भारी धातुएं होती हैं जो जलीय जीवन को नष्ट कर देती हैं।
  • अदालती प्रतिबंधों के बावजूद, बाजार की मांग के कारण कई मूर्तिकार अभी भी प्लास्टर ऑफ पेरिस (PoP) और रासायनिक रंगों का उपयोग कर रहे हैं।

खतरनाक सिंथेटिक रंगों पर वैश्विक प्रतिबंध के बाद अब प्राकृतिक रंगों (Natural Dyes) की ओर दुनिया का ध्यान फिर से आकर्षित हो रहा है। 19वीं सदी के मध्य तक लगभग लुप्त हो चुकी प्राकृतिक रंग इंडस्ट्री को अब वैज्ञानिक नवाचारों के जरिए पुनर्जीवित किया जा रहा है। इस हरित क्रांति का नेतृत्व हैदराबाद में प्रोफेसर जयशंकर तेलंगाना कृषि विश्वविद्यालय (PJTSAU) के तहत संचालित नेचुरल डाई प्रोसेसिंग एंड इनक्यूबेशन सेंटर (NDPIC) कर रहा है।

साल 2016 में तेलंगाना राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (TSPCB) से मिले 1 करोड़ रुपये के अनुदान के साथ, NDPIC ने भारत की पहली बड़े पैमाने की प्राकृतिक-रंग पेंट उत्पादन इकाई स्थापित की। इस इकाई की क्षमता प्रतिदिन दो टन पेंट बनाने की है। यहां वैज्ञानिक सैपन की लकड़ी (Sappan heartwood) को पानी में उबालकर प्राकृतिक रंग निकालते हैं, जिससे मिट्टी की मूर्तियों के लिए पर्यावरण-अनुकूल पेंट और 'इको-होली' रंग तैयार किए जाते हैं।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि बायो-पेंट को अपनाना केवल एक सौंदर्यपरक विकल्प नहीं, बल्कि एक पर्यावरणीय आवश्यकता है। जब भारी धातुओं से युक्त सिंथेटिक रंगों से रंगी मूर्तियां जल निकायों में विसर्जित की जाती हैं, तो वे पूरी खाद्य श्रृंखला को जहरीला बना देती हैं। NDPIC की यह पहल हमारी गहरी सांस्कृतिक परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक मजबूत सेतु का काम करती है, जो यह साबित करती है कि आस्था और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं।

विशेषतासिंथेटिक रंगप्राकृतिक/बायो-डीग्रेडेबल रंग
स्रोतकोलतार, पेट्रोकेमिकल्ससैपन की लकड़ी, पौधों के अर्क
विषाक्तताअत्यधिक (सीसा, पारा, कैडमियम युक्त)शून्य (गैर-विषाक्त और सुरक्षित)
पर्यावरणीय प्रभावगंभीर जल प्रदूषण और स्वास्थ्य जोखिमपर्यावरण के अनुकूल, जलीय जीवन के लिए सुरक्षित

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: प्राकृतिक रंगों का उतार-चढ़ाव

सदियों से भारत प्राकृतिक रंगों के उत्पादन का वैश्विक केंद्र रहा है, जहां नील, मजीठ और हल्दी से बेहतरीन रंग तैयार किए जाते थे। लेकिन 1856 में विलियम हेनरी पर्किन द्वारा सिंथेटिक 'मोवेन' (Mauveine) रंग की खोज के बाद प्राकृतिक रंग उद्योग तेजी से पतन की ओर चला गया। सस्ते रासायनिक विकल्पों ने पर्यावरण-अनुकूल रंगों की जगह ले ले ली। आज के गंभीर पर्यावरणीय संकट ने वैज्ञानिकों को एक बार फिर इतिहास की ओर देखने और भविष्य के लिए टिकाऊ समाधान खोजने पर मजबूर कर दिया है।

"त्योहारों के मौसम में हमारी झीलों और नदियों को धीमे जहर से बचाने के लिए बायो-डीग्रेडेबल पेंट का बड़े पैमाने पर उत्पादन ही एकमात्र व्यावहारिक समाधान है।"
क्या आप जानते हैं?: सैपन की लकड़ी (Caesalpinia sappan), जिसका उपयोग NDPIC द्वारा किया जाता है, मध्यकाल से ही गहरे लाल और नारंगी रंग बनाने के लिए मूल्यवान मानी जाती रही है, और इसमें बेहतरीन एंटी-बैक्टीरियल गुण भी होते हैं!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: इको-पेंट सिंथेटिक पेंट की तुलना में सुरक्षित क्यों हैं?
उत्तर 1: इको-पेंट पूरी तरह से प्राकृतिक पौधों के अर्क से बनाए जाते हैं और इनमें सीसा या पारा जैसी हानिकारक भारी धातुएं नहीं होती हैं, जो जल को प्रदूषित करती हैं।

प्रश्न 2: क्या आम कलाकार आसानी से इन प्राकृतिक रंगों को अपना सकते हैं?
उत्तर 2: हां, NDPIC एक इनक्यूबेशन सेंटर के रूप में काम करता है, जो बुनकरों, कारीगरों और उद्यमियों को प्रशिक्षण और उत्पादन सुविधाएं प्रदान करता है।