सुप्रीम कोर्ट ने एक नई रिपोर्ट में ट्रायल कोर्ट जजों को लिंग‑संवेदनशील प्रथा अपनाने का आदेश दिया है। यह दिशानिर्देश महिलाओं के खिलाफ अपराधों में द्वितीयक ट्रॉमा को रोकने और न्याय प्रक्रिया को अधिक मानवीय बनाने पर केंद्रित है।

Key Takeaways

  • ट्रायल जजों को द्वितीयक ट्रॉमा रोकना चाहिए।
  • गवाहों को ‘अतिथि’ के रूप में सम्मानित किया जाना चाहिए।
  • यौन अपराधों के मामलों को इन‑कैमरा रखकर पीड़ित की गोपनीयता सुरक्षित की जाएगी।

न्यायालय ने "Judgments and Gender: Sensitivity and compassion in writing judgments" शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें ट्रायल जजों को लिंग‑संवेदनशीलता अपनाने के कई व्यावहारिक निर्देश दिए गए हैं। यह रिपोर्ट पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस के नेतृत्व में बनी विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार की गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जजों को केवल कानूनी बुद्धिमत्ता (IQ) ही नहीं, बल्कि भावनात्मक बौद्धिकता (EQ) भी विकसित करनी चाहिए, ताकि यौन हिंसा के मामलों में पीड़ितों को दोबारा ट्रॉमा से बचाया जा सके। इसके अलावा, रक्षा पक्ष को आपत्तिजनक और अनावश्यक प्रश्न पूछने से रोकने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की प्रावधानों का उपयोग करने का निर्देश दिया गया है।

2023 में जारी किए गए "Handbook on Combating Gender Stereotypes" के बाद यह नया दस्तावेज़ भाषा के बजाय व्यवहार पर अधिक जोर देता है। 2023 की पुस्तिका ने लिंग‑स्टीरियोटाइप वाले शब्दों को बदलने पर ध्यान दिया था, जबकि नई रिपोर्ट पीड़ितों के प्रति न्यायिक प्रक्रिया में मानवीय संवेदना लाने की बात करती है।

रिपोर्ट ने कई अपमानजनक वाक्यों के उदाहरण दिए हैं, जैसे पुलिस की टिप्पणी “समझौता कर लो, घर बच जाएगा” या “लिपस्टिक लगाकर शिकायत लिखवाने आई हो?”। ऐसे बयान पीड़ित की आत्मविश्वास को घटाते हैं और न्याय पाने की इच्छा को कम कर देते हैं। इसलिए, रिपोर्ट ने “सहानुभूति‑पूर्ण कोर्ट प्रथाओं” को अपनाने की सिफारिश की है, जिसमें गवाहों को “अतिथि” मानकर सम्मानित किया जाए और पूर्व‑ट्रायल काउंसलिंग के माध्यम से उनका तनाव कम किया जाए।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि यह नई दिशानिर्देश भारतीय न्यायिक प्रणाली में लिंग‑समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे न केवल पीड़ितों का अधिकार सुरक्षित रहेगा, बल्कि न्याय की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।

"जजों को भावनात्मक बौद्धिकता और कानूनी बुद्धिमत्ता दोनों की आवश्यकता है," कहते हैं न्यायशास्त्री डॉ. रवीना सिंह।
Did You Know?: 2024 में भारत में दर्ज किए गए यौन अपराधों की संख्या पिछले वर्ष से 12% बढ़ी थी।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: नए दिशानिर्देशों में प्रमुख बिंदु क्या हैं?

उत्तर: द्वितीयक ट्रॉमा रोकना, गवाहों को अतिथि मानना, इन‑कैमरा ट्रायल और पूर्व‑ट्रायल काउंसलिंग शामिल हैं।

प्रश्न 2: इन दिशानिर्देशों को लागू करने की प्रक्रिया क्या होगी?

उत्तर: राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करेगी और ट्रायल कोर्ट में नियमित निगरानी और मूल्यांकन सुनिश्चित करेगी।