गुड़गांव में आईविफी धोखाधड़ी के बाद राष्ट्रीय महिला आयोग ने अत्याधुनिक विशेषज्ञ समिति बनाई है, जो प्रजनन तकनीक, एआईवीएफ क्लीनिक और बायोलॉजिकल ट्रेसबिलिटी की जांच करेगी।

भारत में अनुमानित 2.8 करोड़ लोग बांझपन से जूझ रहे हैं, और हर साल लगभग 3-3.5 लाख इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (IVF) सत्र आयोजित होते हैं। इस विशाल, मुख्यतः निजी प्रजनन सेवाओं के क्षेत्र में नैतिक उल्लंघन, मेडिकल टूरिज्म और वित्तीय शोषण जैसी गंभीर चिंताएँ उठी हैं। इन घटनाओं के बीच, राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने एक उच्च‑स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जिसका उद्देश्य IVF क्लीनिक, एआईटी (Assisted Reproductive Technology) केंद्र और शुक्राणु‑अंडा बैंक की नियामक ढाँचे की व्यापक समीक्षा करना है।

समिति की संरचना और कार्यक्षेत्र

समिति का अध्यक्षता पूर्व दिल्ली हाई कोर्ट जज जस्टिस आस्था मेनन करेंगे। सदस्य वर्ग में न्यायपालिका, चिकित्सा, फोरेंसिक विज्ञान, कानून प्रवर्तन, स्त्रीरोग विशेषज्ञ, सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ और केंद्र स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल हैं। उनका प्राथमिक काम ART (Regulation) Act, 2021, Surrogacy (Regulation) Act, 2021, और 2026 के संशोधित नियमों की कार्यान्वयन स्थिति की जांच करना होगा।

मुख्य चिंताएँ और नियामक अंतराल

NCW ने कई मुद्दों की ओर इशारा किया है: अनैतिक प्रथा, लिंग चयन जैसी कानूनी सुरक्षा का उल्लंघन, असमान उपचार प्रोटोकॉल, और रोगियों की वित्तीय शोषण। इसके अतिरिक्त, IVF उपचार से जुड़े खर्चों में अक्सर विज्ञापित पैकेज कीमतों से 30‑60 प्रतिशत अधिक वृद्धि देखी जाती है, जिससे कई दंपति कर्ज में डूब जाते हैं। एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, 10 में से 9 जोड़े IVF की लागत से गंभीर आर्थिक दबाव का सामना करते हैं।

गुड़गांव केस की पृष्ठभूमि

गुड़गांव के एक दंपति, राहुल राठौर और उनकी पत्नी, ने दावा किया कि उनके IVF‑जन्मे जुड़वाँ बच्ची उनके जैविक बच्चों नहीं हैं। DNA परीक्षण के बाद उन्होंने कहा कि दोनों बच्चों की जीन संबंधी पहचान उनके साथ नहीं मिलती। यह आरोप IVF क्लीनिक में एम्ब्रियो या सैंपल के गलती से बदल जाने का संकेत देता है। प्रारम्भिक पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं होने के कारण मामला अदालत में पहुंचा, जहाँ 31 मार्च को FIR दाखिल हुई। अब दंपति IVF रिकॉर्ड की जाँच और पूरी जांच की मांग कर रहे हैं।

आगे का मार्गदर्शन और संभावित प्रभाव

समिति को मौजूदा सुरक्षा उपायों—जैसे सूचित सहमति, गोपनीयता, और जैविक ट्रेसबिलिटी—की समीक्षा करनी होगी और अंतरालों की पहचान करके कानूनी एवं नीति सुधार प्रस्तावित करने होंगे। इसके अतिरिक्त, SOP (Standard Operating Procedures) और बेस्ट‑प्रैक्टिस गाइडलाइन तैयार की जाएँगी, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी, नैतिक उपचार सुनिश्चित होगा, और क्लिनिकल प्रोटोकॉल में एकरूपता आएगी। इन सिफ़ारिशों के लागू होने पर IVF इको‑सिस्टम की शासन संरचना मजबूत होगी और भारतीय महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की रक्षा होगी।