कोलकाता हाई कोर्ट ने मेड़ जॉन्सन इंडिया के पूर्व प्रबंध निदेशक के विरुद्ध दर्ज ‘जीवित कीट’ और काली फफूंद के आरोपों को फूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स (FSS) अधिनियम के तहत नहीं, बल्कि IPC के तहत चलाए जाने के कारण खारिज कर दिया। यह निर्णय खाद्य सुरक्षा के नियामक ढाँचे में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दर्शाता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • कोलकाता हाई कोर्ट ने FSS अधिनियम को प्राथमिकता देते हुए केस को खारिज किया।
  • प्रबंध निदेशक की पदस्थापना के आधार पर व्यक्तिगत रूप से अभियोजन नहीं किया जा सकता।
  • जाँच में चार‑साल की देरी और उत्पाद की समाप्ति तिथि ने न्यायिक निर्णय को प्रभावित किया।

कोलकाता हाई कोर्ट ने 8 जुलाई को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया, जिसमें मेड़ जॉन्सन इंडिया के पूर्व प्रबंध निदेशक सैलेश वेंकटेशन के विरुद्ध ‘जीवित कीट’ और काली फफूंद के आरोपों को रद्द कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े अपराधों को केवल फूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स (FSS) अधिनियम के तहत ही दायर किया जाना चाहिए, न कि भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत।

पृष्ठभूमि और शिकायत

2015 में एक उपभोक्ता ने मेड़ जॉन्सन के ‘Enfamil A+ Stage 3’ फॉलो‑अप फ़ॉर्मूला में जीवित कीट तथा काली धूल (फफूंद) मिलने की शिकायत दर्ज की। यह फ़ॉर्मूला 12‑24 महीने के शिशुओं के लिए पोषण सप्लीमेंट के रूप में बेचा जाता है। शिकायतकर्ता ने कहा कि इस असुरक्षित उत्पाद के कारण उनके शिशु को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हुईं।

कानूनी जाँच और चार‑साल की देरी

शिकायत दर्ज होने के बाद 2015 में FIR दायर हुआ, परन्तु 2021 तक मेड़ जॉन्सन इंडिया और उसके प्रबंध निदेशक को नोटिस नहीं भेजा गया। सितंबर 2021 में तीन व्यक्तियों के विरुद्ध चार्ज‑शीट दाखिल की गई, जिसमें कंपनी के वितरक और दवा की दुकान के मालिक भी शामिल थे। अदालत ने यह भी नोट किया कि इस दौरान फ़ॉर्मूला की शेल्फ‑लाइफ़ समाप्त हो चुकी थी, जिससे साक्ष्य की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।

कोर्ट का निर्णय

न्यायाधीश चैताली चटर्जी दास ने कहा कि FSS अधिनियम के सेक्शन 66 के अनुसार केवल वह व्यक्ति जो कंपनी द्वारा खाद्य सुरक्षा हेतु नामित किया गया हो, वह ही दायित्व लेगा। प्रबंध निदेशक का केवल पदनाम ही उन्हें दण्डित नहीं कर सकता। साथ ही, FIR या जांच में वेंकटेशन के विरुद्ध कोई विशिष्ट आरोप नहीं पाया गया, इसलिए उनका अभियोजन ‘कानूनी रूप से अस्थिर’ था।

भविष्य के प्रभाव

यह निर्णय भारतीय खाद्य नियामक ढाँचे में स्पष्टता लाता है। भविष्य में समान मामलों में पुलिस को केवल निर्दिष्ट खाद्य सुरक्षा प्राधिकरणों को ही मामला सौंपना पड़ेगा, और कंपनियों के शीर्ष प्रबंधन को केवल उनके आधिकारिक जिम्मेदारी के आधार पर ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा। उपभोक्ता सुरक्षा के लिए यह एक चेतावनी है कि उत्पाद की गुणवत्ता पर नजर रखी जानी चाहिए, परन्तु कानूनी प्रक्रिया भी उचित ढंग से चलनी चाहिए।