MIOT International में 43 वर्षीय कीर्गिज़स्तानी रोगी को दो छोटे मैग्नेट द्वारा की गई मैग्नेटिक कम्प्रेशन एनोस्मोसिस (MCA) से पित्त नली की पूरी रुकावट हटाकर जिगर की कार्यक्षमता बहाल की गई। यह तकनीक भारत में पहली बार लागू की गई, जिससे बड़े पुनः‑सर्जरी से बचा गया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- MIOT International ने मैग्नेटिक संपीड़न एनोस्मोसिस (MCA) से पित्त नली की पूर्ण रुकावट हटाई।
- प्रक्रिया दो मैग्नेट को ब्लॉक के दोनों पक्षों में रखकर टिश्यू को संपीड़ित करती है, जिससे प्राकृतिक बाइल फ्लो पुनर्स्थापित होता है।
- यह विधि जटिल पुनः‑सर्जरी की आवश्यकता को घटाकर भविष्य में ट्रांसप्लांट रोगियों के उपचार को बदल सकती है।
चेंनी स्थित निजी अस्पताल MIOT International ने एक अत्याधुनिक तकनीक, मैग्नेटिक कम्प्रेशन एनोस्मोसिस (MCA), का उपयोग कर 2025 में जीवित दाता द्वारा लीवर ट्रांसप्लांट कराए गए 43‑वर्षीय कीर्गिज़स्तानी महिला रोगी में पित्त नली की पूरी रुकावट को सफलतापूर्वक हटाया। रोगी को एक वर्ष बाद खुजली और पीलिया के लक्षण दिखे, और जांच में पता चला कि बाइल डक्ट पूरी तरह बंद है, जिससे जिगर की कार्यक्षमता खतरे में थी।
पृष्ठभूमि और चिकित्सीय चुनौती
जीवित दाता लीवर ट्रांसप्लांट के बाद बाइल डक्ट की स्ट्रिक्चर लगभग 42 % रोगियों में देखी जाती है। अधिकांश मामलों में एंडोस्कोपिक स्टेंटिंग या पेरकटेनियस ट्रांसहेपेटिक बाइलरी ड्रेनेज से समाधान होता है, परन्तु इस रोगी में नली पूरी तरह से सील थी, जिससे पारंपरिक उपकरणों से प्रवेश या स्टेंट लगाना असंभव रहा। पुनः‑सर्जरी की जटिलता, संक्रमण का जोखिम और ट्रांसप्लांट की विफलता की संभावना को देखते हुए टीम ने वैकल्पिक विकल्प खोजा।
मैग्नेटिक कम्प्रेशन एनोस्मोसिस (MCA) की प्रक्रिया
एक बहु‑विषयक टीम—लीवर ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट, थेराप्यूटिक एंडोस्कोपिस्ट और एनेस्थीसियोलॉजिस्ट—ने इस प्रक्रिया को अंजाम दिया। पहले गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट ने एंडोस्कोप के माध्यम से एक छोटा मैग्नेट पाचन तंत्र के भीतर रख दिया। फिर रेडियोलॉजिस्ट ने मौजूदा ड्रेनेज ट्रैक्ट के माध्यम से दूसरा मैग्नेट अंदर धकेला। दोनों मैग्नेट टिश्यू के दोनों ओर स्थित हो गए, और धीरे‑धीरे चुंबकीय आकर्षण ने स्कार टिश्यू को संपीड़ित कर उसे घुला दिया।
परिणाम और आगे का मार्ग
पहले हफ्ते में एक्स‑रे द्वारा मैग्नेट की स्थिति की पुष्टि की गई, और दो हफ्ते बाद दोनों मैग्नेट के बीच कोई अंतर नहीं रहा, जिससे ब्लॉक पूरी तरह साफ हो गया। इसके बाद एक स्टेंट स्थापित किया गया ताकि बाइल का निरंतर प्रवाह बना रहे। रोगी को अब सामान्य बाइल फ्लो और जिगर की कार्यक्षमता वापस मिल गई है, और कोई संक्रमण या सेप्सिस की लक्षण नहीं दिखे। इस सफलता ने भारत में सीमित केंद्रों में लागू होने वाली यह तकनीक राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से अपनाने की संभावना को उजागर किया।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि MCA को अधिक अस्पतालों में लागू किया गया, तो यह जटिल बाइल डक्ट स्ट्रिक्चर वाले ट्रांसप्लांट रोगियों के लिए एक कम‑आक्रामक, कम‑जोखिम विकल्प बन सकता है। यह न केवल रोगी की जीवन गुणवत्ता में सुधार करेगा, बल्कि स्वास्थ्य प्रणाली पर आर्थिक बोझ भी घटाएगा। भविष्य में दक्षिण कोरिया और जापान के साथ सहयोग से इस तकनीक के प्रोटोकॉल को और परिष्कृत किया जा सकता है।