राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में मातृ मृत्यु दर का संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है, जहां भीलवाड़ा और बांसवाड़ा में पिछले छह दिनों में नौ और महिलाओं की मौत हो गई। मई से अब तक पांच जिलों में कुल मौतों का आंकड़ा 18 पहुंच चुका है, जिसके बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • भीलवाड़ा और बांसवाड़ा जिलों में छह दिनों के भीतर नौ गर्भवती और प्रसूता महिलाओं की मौत हो गई।
  • मई से अब तक राजस्थान के पांच जिलों के सरकारी अस्पतालों में मातृ मृत्यु का आंकड़ा 18 तक पहुंच चुका है।
  • प्रारंभिक जांच में एनीमिया, कम हीमोग्लोबिन और अन्य जटिलताओं को कारण बताया जा रहा है, जबकि परिवारों ने लापरवाही के आरोप लगाए हैं।

राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं और नवजातों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। भीलवाड़ा और बांसवाड़ा जिलों में 5 जुलाई से 10 जुलाई के बीच नौ महिलाओं की मौत के बाद राज्य का स्वास्थ्य विभाग हरकत में आ गया है। इस गंभीर स्थिति की जांच के लिए जयपुर से विशेष चिकित्सा दल भेजे गए हैं। यह संकट ऐसे समय में आया है जब राज्य पहले से ही बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से जूझ रहा है।

भीलवाड़ा और बांसवाड़ा में मौतों का विवरण

भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में पांच महिलाओं की मौत दर्ज की गई। इनमें से तीन महिलाओं का सिजेरियन ऑपरेशन हुआ था, एक गर्भवती थी और पांचवीं महिला की स्त्री रोग संबंधी सर्जरी हुई थी। भीलवाड़ा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) अरुण गौड़ ने बताया कि मौत के कारणों में गंभीर एनीमिया और पहले से मौजूद बीमारियां शामिल हैं। राजमाता विजयाराजे सिंधिया मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल पूजा गांगराडे के अनुसार, प्राथमिक जांच में दो मौतें कार्डियक अरेस्ट और एक फेफड़ों की समस्या के कारण हुई हैं।

दूसरी ओर, बांसवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल में तीन महिलाओं और एक नाबालिग लड़की की मौत हो गई। जिला कलेक्टर इंद्रजीत यादव की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया है। मृतकों में एक अविवाहित नाबालिग भी शामिल थी, जिसकी ग्रामीण क्षेत्र में असुरक्षित गर्भपात के दौरान हालत बिगड़ने पर अस्पताल लाया गया था, जहां उसने दम तोड़ दिया। बांसवाड़ा के सीएमएचओ खुशपाल सिंह राठौड़ ने कहा कि अचानक महत्वपूर्ण अंगों के काम बंद करने (ड्रॉप इन विटल्स) को प्राथमिक कारण माना जा रहा है।

बढ़ता हुआ संकट और वैश्विक चिंता

यह संकट केवल इन दो जिलों तक सीमित नहीं है। मई महीने से अब तक कोटा, बीकानेर और जोधपुर सहित पांच जिलों में कुल 18 महिलाओं की मौत हो चुकी है। इस भयावह स्थिति को देखते हुए पिछले महीने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी केंद्र सरकार से राजस्थान में मातृ मृत्यु और घटिया दवाओं के मामलों पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी। यह दर्शाता है कि राज्य की स्वास्थ्य प्रणाली में कहीं न कहीं बहुत बड़ी खामी है, जो अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता का विषय बन चुकी है।

प्रणालीगत विफलता और सामाजिक प्रभाव

ग्रामीण राजस्थान में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और एकीकृत बाल विकास सेवाओं (ICDS) की विफलता इन मौतों का मुख्य कारण बनकर उभरी है। पीड़ित परिवारों का आरोप है कि गंभीर एनीमिया से पीड़ित महिलाओं की समय पर उचित निगरानी और पोषण संबंधी जांच नहीं की गई। यह संकट दर्शाता है कि केवल बुनियादी ढांचे का निर्माण काफी नहीं है, बल्कि गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा, दवाओं की गुणवत्ता और समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक है ताकि प्रसव के दौरान किसी भी मां को अपनी जान न गंवानी पड़े।