पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य विभाग ने 10 जिलों में 59 ब्लॉकों और शहरी निकायों में फाइलरियासिस के खिलाफ दवा वितरण शुरू किया है। सरकार ने 85% जनसंख्या को दवा लेने के लिए प्रेरित किया, जिससे 2030 तक रोग को समाप्त करने की उम्मीद है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- 10 जिलों में 59 ब्लॉकों में मुफ्त एंटी‑फिलैरियल दवाएँ वितरित
- 2030 तक फ़िलैरियासिस को समाप्त करने के लिए 85% कवरेज लक्ष्य
- DEC और Albendazole दो दवाएँ, बच्चों, गर्भवती महिलाओं को छोड़कर सभी के लिए मुफ्त
पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य विभाग ने मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (MDA) अभियान का शुभारंभ किया, जिसमें 10 जिलों के 59 ब्लॉकों और शहरी निकायों में फाइलरियासिस के रोकथाम हेतु दवाएँ वितरित की जा रही हैं। इस पहल का उद्देश्य 2030 तक इस रोग को राज्य स्तर पर समाप्त करना है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के लक्ष्य के साथ मेल खाता है।
पृष्ठभूमि और रोग की चुनौती
फ़िलैरियासिस, जिसे अक्सर हाथी रोग या हथि-पॉन कहा जाता है, मच्छर के काटने से फैलता है और संक्रमण के शुरुआती 6‑8 वर्षों तक कोई लक्षण नहीं दिखाता। इस कारण बड़े पैमाने पर पहचान करना कठिन हो जाता है। भारत में लगभग 40% वैश्विक रोग भार है और 20 राज्यों में 21.72 करोड़ लोग जोखिम में हैं। पश्चिम बंगाल में 2026 तक 30,371 लिंफ़ोएडेमा और 5,804 हाइड्रोसील रोगी दर्ज किए गए हैं।
अभियान की कार्यप्रणाली
दवा वितरण में दो प्रमुख एंटी‑फिलैरियल दवाएँ—डायइथाइलकार्बामेज़ीन (DEC) और एल्बेंडाज़ोल—निःशुल्क दी जा रही हैं। सभी पात्र निवासी, दो साल से ऊपर के बच्चे, गर्भवती महिलाएँ और गंभीर रोगियों को छोड़कर, सीधे निरीक्षण (डायरेक्ट ऑब्ज़रवेशन थेरपी) के तहत दवा ले रहे हैं। इस प्रक्रिया से दवा के प्रभाव और संभावित साइड‑इफ़ेक्ट्स, जैसे हल्की चक्कर आना, तुरंत देखे जा सकते हैं।
सरकारी प्रतिबद्धता और सामाजिक पहल
स्वास्थ्य मंत्री डॉ. शरदवात मुखोपाध्याय ने कार्यक्रम के उद्घाटन में कहा कि केंद्र की नीति अब राज्य की नीति बन गई है और सभी स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता सहयोगी भूमिका निभाएँ। इस अवसर पर स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख, राज्य स्वास्थ्य सचिव और अन्य अधिकारियों ने स्वयं दवा का सेवन किया, जिससे जनता में भरोसा बढ़ाने का उद्देश्य था।
भविष्य की दिशा और चुनौतियाँ
85% कवरेज लक्ष्य हासिल करने के लिए जागरूकता अभियानों, स्कूल‑आधारित शिक्षा और स्थानीय नेताओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। यदि सफल रहा, तो यह मॉडल अन्य उच्च रोगप्रसार वाले राज्यों में दोहराया जा सकता है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर फ़िलैरियासिस को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ेगा।