जम्मू-कश्मीर के निजी अस्पतालों में हर दस में से नौ जन्म सी-सेक्शन के जरिए होते हैं, जो देश में सबसे अधिक है। यह लेख राष्ट्रीय सर्वेक्षण डेटा, विशेषज्ञों की राय और विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशानिर्देशों को मिलाकर इस उछाल के कारणों और संभावित जोखिमों की जाँच करता है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • जम्मू‑कश्मीर के निजी अस्पतालों में 90% से अधिक सी‑सेक्शन दर है, राष्ट्रीय औसत से दो‑तीन गुना अधिक।
  • उच्च जोखिम वाली गर्भधारण, वृद्ध माताएँ, एआरटी उपयोग और निजी क्षेत्र की व्यावसायिक प्रथा इस वृद्धि के प्रमुख कारण हैं।
  • अनावश्यक सर्जरी के संभावित स्वास्थ्य‑सम्बंधी जोखिमों को रोकने के लिए सूचित सलाह और नियामक निगरानी आवश्यक है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण‑6 (NFHS‑6, 2023‑24) के नवीनतम आँकड़े दिखाते हैं कि जम्मू‑कश्मीर के निजी अस्पतालों में 90 % से अधिक नवजात सी‑सेक्शन द्वारा जन्मे हैं, जो भारत के किसी भी राज्य में सबसे अधिक दर्ज किया गया है। पश्चिम बंगाल (87.7 %) और तेलंगाना (83.9 %) के बाद यह क्षेत्र इस सूची में शीर्ष पर है, जबकि निजी क्षेत्र का राष्ट्रीय औसत केवल 54.1 % है।

डेटा का विस्तृत विश्लेषण

समग्र रूप से, भारत में सभी जन्मों में सी‑सेक्शन की दर 27.2 % तक पहुंच गई है, जो NFHS‑5 (21.5 %) की तुलना में तीव्र वृद्धि दर्शाती है। सार्वजनिक अस्पतालों में यह वृद्धि मामूली रही (14.3 % से 16.9 %), जबकि निजी संस्थानों में 47.4 % से 54.1 % तक उछाल आया है। यह अंतर न केवल निजी‑सार्वजनिक सुविधाओं के बीच अंतर को उजागर करता है, बल्कि संभावित अनावश्यक सर्जरी की ओर इशारा भी करता है।

विशेषज्ञों की राय

सिर्फ़ आँकड़े ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विशेषज्ञों ने इस प्रवृत्ति के पीछे कई कारण बताए हैं। स्किम्स मेडिकल कॉलेज के गाइनकोलॉजी विभाग के डॉ. सामी जान ने कहा, “तीसरी‑स्तरीय रेफरल सिस्टम में उच्च‑जोखिम गर्भधारणों का प्रवाह, देर से रेफरल, बेहतर डायग्नोस्टिक तकनीक, मौसम‑भौगोलिक चुनौतियां और माताओं की उम्र में वृद्धि सभी मिलकर सी‑सेक्शन की आवश्यकता बढ़ाते हैं।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि निजी अस्पतालों में सुविधाजनक शेड्यूलिंग, वित्तीय प्रोत्साहन और कभी‑कभी माताओं की पसंद भी इस प्रवृत्ति को तेज़ करती है।

जम्मू‑कश्मीर के एक मनोचिकित्सक, डॉ. निकिल गुप्ता ने कहा, “प्रसव दर्द का डर, शिशु की सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता और सामाजिक मान्यताएँ अक्सर सी‑सेक्शन के चयन को प्रभावित करती हैं। उचित सूचित सहमति और मनोवैज्ञानिक समर्थन के बिना ये निर्णय जोखिमपूर्ण हो सकते हैं।”

वैश्विक मानक और स्वास्थ्य जोखिम

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का मानना है कि जनसंख्या स्तर पर 10 % से अधिक सी‑सेक्शन दर में कोई अतिरिक्त मातृ‑शिशु मृत्यु दर में कमी नहीं देखी जाती। अतः 90 % जैसी दरें न केवल आर्थिक बोझ बढ़ाती हैं, बल्कि संभावित जटिलताओं—जैसे संक्रमण, भविष्य में गर्भावस्था में कठिनाई, और शिशु के माइक्रोबायोम में परिवर्तन—का जोखिम भी बढ़ाती हैं।

नीति‑निर्देश और भविष्य की दिशा

निजी‑सार्वजनिक अंतर को पाटने के लिए नियामक उपाय आवश्यक हैं। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि अस्पतालों को “सूचित सहमति” प्रक्रिया को अनिवार्य बनाना चाहिए, जिसमें वैकल्पिक प्रसव विकल्पों की विस्तृत चर्चा हो। साथ ही, चिकित्सकों के लिए लिटिगेशन‑फ्रेंडली माहौल बनाकर अनावश्यक सर्जरी से बचाव किया जा सकता है। अंत में, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में समय पर रेफरल प्रणाली को सुदृढ़ करना, माताओं की उम्र में वृद्धि को सामाजिक रूप से स्वीकार्य बनाना और एआरटी जैसी प्रजनन तकनीकों की उचित निगरानी भी इस समस्या के समाधान में मददगार हो सकते हैं।