जून 2026 में हस्ताक्षरित इरान‑यूएस समझौते ने 60‑दिन की शांति का वादा किया था, परन्तु तीन हफ़्तों से भी कम समय में वह ढह गया। इस विफलता के पीछे मूलभूत मुद्दों का समाधान न होना और क्षेत्रीय शक्ति‑संतुलन की जटिलताएँ मुख्य कारण बनती हैं।
जून 17, 2026 को संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान ने एक समझौता (MOU) किया, जिसमें हॉर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलना और 60 दिन के भीतर स्थायी समाधान खोजने का लक्ष्य रखा गया। यह समझौता, जो शिपिंग को सुरक्षित करने और ईरान को अपने तेल के राजस्व को पुनः प्राप्त करने की अनुमति देता था, ने मूलभूत भू‑राजनीतिक प्रश्नों को अनदेखा कर दिया।
पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक संदर्भ
इ्रान‑अमेरिका के बीच तनाव 1979 की इस्लामी क्रांति से शुरू होते हुए, 2000 के दशक में परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों के कारण और भी गहरा हो गया। पिछले दो दशकों में कई बार वार्ता का दौर रहा, परंतु विश्वास‑घात, सशस्त्र प्रतिरोध और आर्थिक दबाव ने स्थायी शांति को कठिन बना दिया। 2026 का MOU, इस लंबी जंग का एक अस्थायी ठहराव था, न कि अंतिम समाधान।
समझौते की कमजोरियां
समझौते में केवल शिपिंग रोकना और तेल बिक्री की अनुमति देना शामिल था; हॉर्मुज पर ट्रैफ़िक टोल, ईरान की बंधक जमाख़र्चा गई संपत्तियों की वापसी, तथा परमाणु कार्यक्रम का स्थायी समाधान को छोड़ दिया गया। इन मुद्दों को बिना स्पष्ट रूपरेखा के छोड़ना, दोनों पक्षों को आगे की वार्ता में असुरक्षित बनाता रहा।
सैन्य पुनरुद्धार और क्षेत्रीय गतिशीलता
संझौते के बाद ईरान ने अपने मिसाइल और लॉन्चर स्टॉक को पुनः स्थापित किया, जिससे अब वह अपने प्री‑कोन्फ्लिक्ट शस्त्रागार का आधे से अधिक हिस्सा नियंत्रित करता है। साथ ही, ईरान ने बैहरैन और कुवैत में अमेरिकी ठिकानों को ड्रोन और मिसाइल से निशाना बनाया, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव फिर से बढ़ गया।
राजनीतिक माहौल और भविष्य की संभावनाएँ
डोनाल्ड ट्रम्प की प्रशासनिक नीति और उनका कम लोकप्रियता, दोनों पक्षों के लिए समझौते को ‘समय की बर्बादी’ बना देती है। ट्रम्प ने ईरान को ‘बुराई, रोगी लोग’ कहा, जिससे कूटनीतिक स्वर तेज़ी से कठोर हो गया। इस प्रकार, बिना स्वतंत्र निरीक्षक या तटस्थ मध्यस्थ के, दोनों पक्ष स्वयं ही समझौते को लागू करने की कोशिश में फँस गए हैं।
संघर्ष का अंत तब तक नहीं देखेगा जब तक हॉर्मुज पर सभी आर्थिक, सुरक्षा और परमाणु-संबंधी प्रश्नों को पारदर्शी और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य ढंग से हल नहीं किया जाता। तब तक ‘शांतिपूर्ण युद्ध’ ही इरान‑यूएस के बीच बना रहेगा।