लिबरेटम के ‘कल्चरल ऑनर’ समारोह में सलमान रश्दी ने बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने स्वतंत्र अभिव्यक्ति को केवल अपने समर्थकों तक सीमित कर दिया है। उन्होंने भारत में जलवायु संकट और स्कूलों में पुस्तक प्रतिबंधों को भी गंभीर चुनौती के रूप में उजागर किया।
इंग्लैंड में लिबरेटम द्वारा आयोजित 14वें वार्षिक ‘कल्चरल ऑनर’ समारोह में भारतीय मूल के ब्रिटिश‑अमेरिकी लेखक सलमान रश्दी ने अपनी मान्यता को स्वीकार किया और आज़ादी‑अभिव्यक्ति के संघर्ष पर खुली टिप्पणी की। यह सम्मान, जो पहले वी.एस. नैपाल, ज़ाहा हदीद और फ़्रांसिस फ़ोर्ड कोपोला को भी मिला है, साहित्यिक क्षेत्र में विश्व‑व्यापक प्रभाव को मान्यता देता है।
संयुक्त राज्य में अभिव्यक्ति की नई चुनौतियां
रश्दी ने रॉयटर्स के साथ एक वीडियो साक्षात्कार में कहा, “पहले संशोधन के देश में भी अब स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर एक गंभीर हमला हो रहा है।” उन्होंने कहा कि जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ‘फ्री एक्सप्रेशन’ की बात करते हैं, तो उनका मतलब केवल उन लोगों से है जो उनके विचारों से सहमत हैं। इस पर उन्होंने पत्रकारों, कॉमेडियनों, लेखकों और कलाकारों पर लगातार दबाव डालने का उल्लेख किया, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरा बनता जा रहा है।
अमेरिका में पुस्तक प्रतिबंधों की बढ़ती लहर
रश्दी ने बताया कि स्कूलों में पुस्तक प्रतिबंधों की संख्या बढ़ रही है, जहाँ 2021‑2025 के बीच 45 राज्यों में 22,810 प्रतिबंध दर्ज किए गए। इन प्रतिबंधों ने 3,752 अलग‑अलग शीर्षकों को प्रभावित किया, विशेषकर गैर‑कथा (non‑fiction) पुस्तकों को काफी सेंसर किया गया। उन्होंने कहा, “यह एक द्विपक्षीय संघर्ष है, लेकिन यह वह लड़ाई नहीं है जिसकी हमें उम्मीद थी।” इस संदर्भ में उन्होंने अमेरिकी शिक्षा प्रणाली की वर्तमान स्थिति और साहित्यिक विविधता के लिए खतरे को उजागर किया।
भारत में जलवायु संकट और सामाजिक चिंता
रश्दी ने अपने मूल देश भारत की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि “मेरे भारत के मित्र बहुत चिंतित हैं, विशेषकर जलवायु परिवर्तन के कारण।” उन्होंने बताया कि पर्यावरणीय आपदा और सामाजिक असमानता के बीच भारत को भी अपने “कंधे कसकर लड़ाई” लड़नी होगी, क्योंकि यह लड़ाई केवल पश्चिमी लोकतंत्र तक सीमित नहीं है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) पर विचार
एक अलग साक्षात्कार में रश्दी ने AI के साहित्यिक क्षेत्र में भूमिका को नकारा। उन्होंने कहा, “मैं AI में शून्य से भी कम रुचि रखता हूँ। यह बड़ी मात्रा में डेटा को दोहराता है, लेकिन वह रचनात्मकता नहीं जो कला में चाहिए—कुछ नया, कुछ अनोखा।” इस बयान ने तकनीकी जगत में भी चर्चा को जन्म दिया, जहाँ लेखक और तकनीकी विशेषज्ञ AI‑जनित सामग्री के भविष्य को लेकर बहस कर रहे हैं।
रश्दी के इन बयानों ने वैश्विक स्तर पर स्वतंत्र अभिव्यक्ति, साहित्यिक विविधता और पर्यावरणीय सुरक्षा के मुद्दों को फिर से प्रमुखता से खड़ा किया है। उनका संदेश स्पष्ट है: “हमें अपने कंधे कसकर लड़ाई लड़नी है, वह भी उस लड़ाई को जीतने के बाद जो हमने सोचा था।”