भारत के रिफाइनर उच्च गुणवत्ता वाले गैसोलीन का उत्पादन कर रहे हैं, जिससे रूस की घरेलू कमी को पूरा किया जा रहा है। जबकि तेल मंत्री ने सीधे बिक्री को नकारा है, व्यापारिक रूट्स की पारदर्शिता अब सवाल बन गई है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- रूस की रिफाइनिंग क्षमता 40% से अधिक घट गई, जिससे गैसोलीन आयात बढ़ा।
- भारतीय रिफाइनर यूरो-5 मानक के गैसोलीन का निर्यात कर रहे हैं, जो रूस की आवश्यकताओं के अनुरूप है।
- ऑफ़शोर ट्रेडर्स के माध्यम से भारत‑रूस गैसोलीन प्रवाह का वास्तविक पैमाना अभी स्पष्ट नहीं है।
रूस‑यूक्रेन युद्ध के बाद, भारत ने रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े आयातकर्ता बनते हुए, अब अपनी गैसोलीन निर्यात को भी रूस की ओर मोड़ दिया है। राइटरस ने बताया कि लगभग 60,000 मीट्रिक टन गैसोलीन भारत से रूस को भेजा गया, लेकिन तेल मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इस बात को स्पष्ट किया कि भारतीय कंपनियों ने सीधे इस बिक्री में भाग नहीं लिया।
पृष्ठभूमि और रणनीतिक संदर्भ
रूस, जो पहले विश्व के प्रमुख कच्चे तेल निर्यातकों में से एक है, अब अपनी रिफाइनरी क्षमताओं में बड़े पैमाने पर गिरावट देख रहा है। यूक्रेन द्वारा किए गए ड्रोन हमले और निरंतर हड़तालों ने लगभग 40% रिफाइनिंग क्षमता को निलंबित कर दिया है। परिणामस्वरूप, घरेलू गैसोलीन की कमी को पूरा करने के लिए रूसी सरकार ने आयात की दिशा में मोड़ दिया है।
रूस की रिफाइनिंग संकट
ग्रांट थॉर्नटन के तेल‑गैस पार्टनर सौरव मित्रा के अनुसार, जून 2026 में रूसी रिफाइनरी आउटपुट 2009 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुँचा। कुल मिलाकर, गैसोलीन उत्पादन में लगभग 25% की साल‑दर‑साल गिरावट दर्ज की गई। यही कारण है कि 83 में से 78 क्षेत्रों में गैसोलीन की कमी या आपूर्ति में व्यवधान की रिपोर्टें मिल रही हैं।
भारत की निर्यात क्षमता
भारतीय रिफाइनर विश्व के शीर्ष गैसोलीन निर्यातकों में गिने जाते हैं, जहाँ निर्यात मात्रा 350‑400 किलॉमीटर बैरल प्रति दिन तक पहुँचती है। इन रिफाइनरियों की उत्पादन लाइनों में यूरो‑5 मानक को पूरा करने वाली कई ग्रेड्स उपलब्ध हैं, जो रूस के घरेलू बाजार के अनुरूप है। इस कारण ही भारत को रूस की गैसोलीन आपूर्ति में एक विश्वसनीय विकल्प माना जा रहा है।
व्यापारिक रूट की अस्पष्टता
ट्रेडिंग डेटा दिखाता है कि ‘अग्नि’ नामक टैंकर ने 20 जून को वादिनार से गैसोलीन लोड किया, फिर फुजैराह से गुजरते हुए सूएज़ नहर में उत्तर दिशा में प्रवेश किया। यह जटिल रूट, साथ ही ट्रेडर्स की मध्यस्थता, इस लेन‑देन को पारदर्शिता‑हीन बनाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के अप्रत्यक्ष ट्रांसफ़र, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के तहत भी, व्यापार को जारी रखने का एक तरीका है।
भविष्य की संभावनाएँ
रूस ने अब 400,000 टन गैसोलीन मासिक आयात का लक्ष्य रखा है, जिसमें बेलारूस, भारत और अन्य देशों से सप्लाई शामिल है। साथ ही, रूसी संसद ने ईंधन आयात पर सब्सिडी देने हेतु कर‑कोड में संशोधन किया है, जिससे भारतीय गैसोलीन की कीमत पर आधारित गणना की जा रही है। इस परिप्रेक्ष्य में, भारत‑रूस ऊर्जा संबंध नई रणनीतिक गतिशीलता को दर्शाते हैं, जिसके आर्थिक और भू‑राजनीतिक प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं।