भारत की एक्ट ईस्ट नीति, जो आर्थिक सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को सुदृढ़ करने के लिए बनाई गई है, आज क्षेत्रीय अस्थिरता और चीन की बढ़ती आक्रामकता के कारण नई चुनौतियों का सामना कर रही है। साथ ही, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और न्यूज़ीलैंड जैसी देशों के साथ हालिया राजनयिक दौरे नई संभावनाओं को उजागर कर रहे हैं।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • भारत की एक्ट ईस्ट नीति आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को गहरा करने का लक्ष्य रखती है।
  • क्षेत्रीय अस्थिरता और पूर्वोत्तर भारत में बुनियादी ढांचे की कमी चुनौतियां पेश करती हैं।
  • चीन की बढ़ती आक्रामकता और अमेरिका की बदलती नीति भविष्य को आकार देती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड यात्रा ने भारत के एक्ट ईस्ट नीति के महत्व को फिर से उजागर किया। 2014 में 12वें एशियान-इंडिया शिखर सम्मेलन पर मोदी ने ‘लुक ईस्ट’ को ‘एक्ट ईस्ट’ में बदलने का ऐलान किया, जिससे न केवल शब्दावली बल्कि नीति के वास्तविक उद्देश्यों में भी परिवर्तन आया। इस नीति का मूल उद्देश्य आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना, सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करना और इन्डो‑पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी स्थापित करना है।

नीति का ऐतिहासिक विकास

भारत का पूर्वी एशिया के साथ संबंध प्राचीन काल से ही व्यापार, संस्कृति और धर्म के माध्यम से जुड़ा रहा है। 1991 में ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ के रूप में आधिकारिक तौर पर पुनर्जीवित यह पहल मुख्यतः दक्षिण‑पूर्व एशिया के आर्थिक पहलुओं पर केंद्रित थी, परन्तु समय के साथ इसका दायरा एशिया‑पैसिफिक तक विस्तारित हो गया। मोदी के शब्दों में, “जब हम पूर्व की ओर देखते हैं, तो हम संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी तट को देखते हैं,” यह दर्शाता है कि भारत अब विश्व मंच पर एक संतुलित, द्विपक्षीय शक्ति बनना चाहता है।

वर्तमान चुनौतियां

नीति के सामने कई जटिल बाधाएं हैं। पड़ोसी देशों में पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में राजनीतिक अस्थिरता निरंतर जोखिम पैदा करती है। साथ ही, संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी बाहरी शक्ति की नीतियों में असंगतियां भारत के रणनीतिक संतुलन को जटिल बनाती हैं। पूर्वोत्तर भारत में बुनियादी ढांचे की कमी—जैसे सीमित हवाई अड्डे, पोर्ट और सड़क नेटवर्क—इसे एशिया‑पैसिफिक के प्रति एक प्रभावी द्वार बनाने में बाधक है। चीन की बढ़ती समुद्री शक्ति और ‘ब्लू वॉटर’ अभिप्राय भी यह स्पष्ट करते हैं कि भारत को अपनी समुद्री क्षमताओं को तेज़ी से सुदृढ़ करना आवश्यक है।

भविष्य की संभावनाएं

इन चुनौतियों के बावजूद, एक्ट ईस्ट नीति ने ASEAN देशों के साथ साझेदारी को गहरा किया है, जिससे भारत को एक जिम्मेदार समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित किया गया है। SAGAR, IPOI और MAHASAGAR जैसी पहलें क्षेत्रीय सुरक्षा, मानवीय सहायता और जलवायु परिवर्तन के प्रति सहयोग को सुदृढ़ करती हैं। छोटे द्वीप राष्ट्रों की आवाज़ को मंच प्रदान कर, भारत अपने समान लोकतांत्रिक मूल्यों को साझा करने वाले देशों के बीच विश्वसनीय साझेदार बन रहा है। जैसा कि ताइवान के विद्वान तेह्यी शिएह ने कहा, “पश्चिम पूर्व को जीने का तरीका सिखा सकता है, पर अंत में पूर्व को पश्चिम को जीवन जीना सिखाना होगा।” यह विचार भारत के लिए एक रणनीतिक दिशा-निर्देश बन सकता है।