अवामी इत्तेहाद पार्टी (AIP) ने केंद्र सरकार के जनसांख्यिकीय बदलावों की जांच करने वाले उच्च स्तरीय पैनल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी का कहना है कि LoC के पास से विस्थापित हुए परिवारों को इस मूल्यांकन में पूरी तरह नजरअंदाज किया गया है।
मुख्य बातें
- AIP ने केंद्र के जनसांख्यिकीय पैनल पर LoC के विस्थापितों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया।
- पैनल पर केवल बाहरी लोगों के बजाय स्थानीय आबादी के पलायन पर ध्यान देने की मांग की गई।
- पार्टी ने कश्मीरी पंडितों और संघर्ष के कारण विस्थापित परिवारों को शामिल करने की अपील की।
जम्मू-कश्मीर में जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का अध्ययन करने वाली उच्च स्तरीय समिति पर अवामी इत्तेहाद पार्टी (AIP) ने तीखा हमला बोला है। सांसद इंजीनियर राशिद के नेतृत्व वाली इस पार्टी ने कहा है कि केंद्र द्वारा गठित यह पैनल उन परिवारों की पीड़ा को समझने में विफल रहा है, जो नियंत्रण रेखा (LoC) के पास से अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर हुए थे।
AIP के प्रवक्ता इनाम उन नबी ने कहा कि कोई भी समिति जम्मू-कश्मीर का व्यापक जनसांख्यिकीय मूल्यांकन तब तक नहीं कर सकती, जब तक वह उन पूरी आबादी को नजरअंदाज करती रहे जो हिंसा और गोलाबारी के कारण अपने पैतृक स्थानों से विस्थापित हुई है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकार उन परिवारों को वापस लाने के लिए कोई ठोस कदम उठा रही है जिन्होंने केवल अपने बच्चों और बुजुर्गों को बचाने के लिए पलायन किया था?
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन केवल नए लोगों के आगमन का मामला नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के पलायन का भी लेखा-जोखा है जो संघर्ष के कारण खाली हो गए। यदि पैनल केवल 'इनफ्लो' (आगमन) पर ध्यान केंद्रित करता है और 'आउटफ्लो' (पलायन) को भूल जाता है, तो रिपोर्ट अधूरी और पक्षपाती मानी जाएगी।
जनसांख्यिकीय सुधार का अर्थ केवल नए आंकड़ों को जोड़ना नहीं, बल्कि उन लोगों को बहाल करना भी है जिन्हें संघर्ष ने उनके घरों से बेदखल कर दिया।
पार्टी ने विशेष रूप से जुमगुंड, माचिल, केरन, कर्णाह, गुरेज, उरी, पुंछ और मेंढर जैसे क्षेत्रों का उल्लेख किया, जहाँ 1947 से लगातार पलायन देखा जा रहा है। इसके अलावा, AIP ने रोहिंग्याओं के साथ पैनल की कथित बातचीत पर भी आपत्ति जताई और मांग की कि समिति को सबसे पहले कश्मीरी पंडितों और संघर्ष से प्रभावित स्थानीय लोगों की बात सुननी चाहिए।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों में दशकों से अस्थिरता रही है। 1947 के विभाजन के बाद से ही, सीमा पर होने वाली गोलाबारी और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण कई समुदायों को अपने कृषि योग्य भूमि और घर छोड़ने पड़े हैं, जिससे इन क्षेत्रों में एक 'जनसांख्यिकीय शून्य' पैदा हो गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. AIP का मुख्य आरोप क्या है?
AIP का आरोप है कि जनसांख्यिकीय पैनल LoC के पास से विस्थापित हुए स्थानीय परिवारों की स्थिति को अनदेखा कर रहा है।
2. यह पैनल किसके नेतृत्व में काम कर रहा है?
यह उच्च स्तरीय समिति सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर के नेतृत्व में काम कर रही है।