बारूपुर में 12 वर्षीय बालिका की लापता होने के बाद उसका शव मिलने के बाद हिंसा भड़क गई। मुख्य आरोपी प्रबास मंडल को पुलिस एन्काउंटर में मार दिया गया, जो राज्य में बीजेपी के सत्ता ग्रहण के बाद पहली बार हुई।
बारूपुर, पश्चिम बंगाल – 8 जुलाई 2026 को सुबह 12:45 बजे बारूपुर पुलिस ने एक नाटकीय एन्काउंटर में 12 साल की बालिका के रेप‑हत्याकांड के मुख्य आरोपी प्रबास मंडल को मार गिराया। यह घटना उस समय घटी जब पुलिस ने सौर्यपुर में अपराध स्थल की पुनःस्थापना (रीकंस्ट्रक्शन) के लिए आरोपी को ले जाया था। मंडल ने एक पुलिस अधिकारी का सेवा हथियार छीन लिया, एक गोली चलाई और भागने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने प्रत्युत्तर में गोलीबारी की और वह अस्पताल पहुँचते ही मृत घोषित हुआ।
पृष्ठभूमि और जांच
बारूपुर में 4 जुलाई को 12 साल की बालिका लापता हुई, और 5 जुलाई को उसके शव को सौर्यपुर के एक तालाब से निकाला गया। प्रारम्भिक जांच में पता चला कि मंडल ने बच्ची को अपहरण कर यौन शोषण किया, फिर उसे तालाब में फेंक दिया। सीसीटीवी फुटेज में मंडल को पीड़िता के साथ दिखाया गया है, और चार अन्य संदिग्ध – आनंद सरदार, दीबाकर सरदार और कबीर मोला – को भी गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने इस मामले को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 (बलात्कार), 70(2) (समूह बलात्कार), 103(1) (हत्या) और 238 (साक्ष्य में फेरबदल) तथा पीओसीएसओ अधिनियम के तहत दर्ज किया है।
हिंसा और दंगे
बालिका के शव की बरामदगी के बाद स्थानीय लोगों में गुस्सा फूट पड़ा। दंगों में पुलिस वाहनों को तोड़ा गया, सड़कों और रेलवे ट्रैक को ब्लॉक किया गया और एक व्यक्ति को भी भीड़ ने लैंसिंग कर दिया। पुलिस ने लैंसिंग के संबंध में 20 लोगों को गिरफ्तार किया। यह हिंसा राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद पहली बड़ी सार्वजनिक प्रतिक्रिया थी, क्योंकि मई 2026 में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल की थी।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने पीड़िता के परिवार से मुलाकात की और कहा कि अपराधियों को कड़ी सजा दी जाएगी। बीजेपी के प्रवक्ता देबजित सारकार ने एन्काउंटर को “दैवीय न्याय” कहा, जबकि त्रिनमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने इसे “जंगल का कानून” करार दिया। विपक्ष ने एन्काउंटर की वैधता पर सवाल उठाए, जबकि सरकार ने इसे कानून व्यवस्था की पुनर्स्थापना के रूप में पेश किया।
भविष्य के प्रभाव
यह एन्काउंटर पश्चिम बंगाल में पुलिस की कार्रवाई के नए मानक स्थापित कर सकता है, विशेषकर जब सत्ता में परिवर्तन के बाद सार्वजनिक दबाव बढ़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एन्काउंटर का उपयोग न्यायिक प्रक्रिया की जगह ले लेता है तो यह मानवाधिकारों के उल्लंघन की ओर ले जा सकता है। साथ ही, इस मामले ने बाल यौन शोषण के खिलाफ कड़ी सजा की मांग को और तीव्र किया है, जिससे भविष्य में कानून निर्माण में संशोधन की संभावना बन सकती है।