पंचकुला में एक लफ़्ज़ी कोर्ट में लिफ्टनेंट कर्नल आशिष चंदोक ने वकील मनिंदर सिंह बित्ता पर शारीरिक हमला, अनुचित बंदी बनाना और समझौता दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करवाने का आरोप लगाया है। पुलिस ने कई भारतीय न्याय संहिता धारा के तहत FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- लिफ्टनेंट कर्नल आशिष चंदोक ने वकील मनिंदर सिंह बित्ता पर हमला और बंदी बनाना का आरोप लगाया।
- FIR में BNS की धारा 115, 117(2), 127(2), 190, 191(2) और 351(2) लागू हुई हैं।
- पुलिस ने मेडिकल रिपोर्ट, शिकायत और स्थल सत्यापन के बाद केस को दर्ज किया।
पंचकुला के जिला कोर्ट के परिवारिक मामलों के सुनवाई के दौरान 9 जुलाई को लिफ्टनेंट कर्नल आशिष चंदोक ने बताया कि उन्हें वकील मनिंदर सिंह बित्ता और उनके सहयोगियों द्वारा शारीरिक रूप से पीटा गया तथा अनुचित रूप से एक कमरे में बंद कर समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया।
घटना की पृष्ठभूमि
कर्नल चंदोक ने बताया कि वह और उनकी पत्नी एक साल से अलग रह रहे हैं और पत्नी द्वारा दायर तीन अलग‑अलग मामलों की सुनवाई पंचकुला जिला कोर्ट में चल रही थी। सुनवाई के दौरान बित्ता ने कई वकीलों को बुलाकर विवाद को बढ़ाया, जिसके बाद चंदोक को कोर्ट के बाहर 10‑17 वकीलों द्वारा हमला किया गया। बाद में उन्हें एक अन्य वकील के चैंबर में ले जाया गया जहाँ फिर से हमला और धमकी दी गई।
कानूनी प्रक्रिया और FIR
सेक्टर 7 पुलिस स्टेशन ने 9 जुलाई को शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की। FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115 (आक्रमण), 117(2) (गैरकानूनी रोक), 127(2) (हिंसा), 190 (दुर्व्यवहार), 191(2) (अनुचित प्रतिबंध) और 351(2) (भयभीत करना) का उल्लेख है। चंदोक को सेक्टर 6 के सिविल अस्पताल में जांच कराई गई, जहाँ दो धक्के से चोटें पाई गईं।
वकील बित्ता की प्रतिक्रिया
बित्ता ने इन आरोपों को “पूरी तरह झूठा, निराधार और बनावटी” कहा और दावा किया कि वास्तव में लिफ्टनेंट कर्नल ने ही उन्हें हमला किया था। उन्होंने बताया कि घटना के तुरंत बाद उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी।
भविष्य की संभावनाएँ और सामाजिक प्रभाव
यदि FIR के आधार पर आरोप सिद्ध होते हैं, तो बित्ता पर सजा के साथ-साथ वकील एटिक्स कोड के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है। इस प्रकार की घटनाएँ न्यायिक प्रणाली में भरोसे को कम कर सकती हैं और सेना के अधिकारियों के साथ न्यायिक प्रक्रिया में असमानता के मुद्दे को उजागर करती हैं। न्यायालयों में सुरक्षा उपायों की पुनः समीक्षा और वकील‑क्लाइंट संबंधों में स्पष्ट दिशानिर्देशों की आवश्यकता पर चर्चा तेज़ हो रही है।