केरल के एक दंत कॉलेज में छात्र की मौत के बाद प्रोफ़ेसर एम.के. राम की एंटिसिपेटरी बॉल को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। न्यायालय ने इस व्यवहार को ‘अमानवीय’ कहकर कड़ी सजा की मांग की।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- सुप्रीम कोर्ट ने प्रोफ़ेसर की एंटिसिपेटरी बॉल को अस्वीकार किया
- न्यायालय ने छात्र के प्रति ‘अमानवीय’ व्यवहार को कड़ा दंड दिया
- केस में कास्ट-आधारित उत्पीड़न और ऋण वसूली के आरोप भी शामिल हैं
केरल के अनजाराकंडी डेंटल कॉलेज में 10 अप्रैल को बीडीएस प्रथम वर्ष छात्र निथिन राज की मृत्यू ने राष्ट्रीय स्तर पर तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न की। छात्र के परिवार और कई सहपाठियों ने कहा कि वह लगातार दो प्रोफ़ेसरों—एम.के. राम और संगिता नाम्बियर—के शोषण के बाद आत्महत्या कर गया।
कानूनी पृष्ठभूमि और ब्रीफ़
प्रोफ़ेसर एम.के. राम, जो डेंटल एनीमॉली विभाग के पूर्व प्रमुख थे, ने हाई कोर्ट में एंटिसिपेटरी बॉल के लिए याचिका दायर की। उनके वकील डी.एस. नायडू ने तर्क दिया कि छात्र पर हुए अपमानजनक कार्य एक महीने पहले हुए थे, जबकि आत्महत्या से कुछ घंटे पहले एक ऋण वसूली एजेंट ने उसे परेशान किया। उन्होंने कहा, “यदि बॉल दी गई तो शिक्षकों के अनुशासन कार्य में हिचकिचाहट होगी।”
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
7 जुलाई, 2026 को दो न्यायाधीश—न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता—के बेंच ने एंटिसिपेटरी बॉल को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा, “आप छात्रों के साथ इस तरह बर्ताव नहीं कर सकते। ‘अमानवीय’ शब्द ही इस व्यवहार को वर्णित करता है।” न्यायालय ने यह भी कहा कि शिक्षक को छात्रों के सामने अपमानित करने की इजाज़त नहीं है, क्योंकि इससे छात्र वर्ग में भय और असुरक्षा की भावना बढ़ेगी।
आपराधिक आरोप और सामाजिक प्रभाव
एम.के. राम पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत आत्महत्या के सह-उत्पादन के साथ-साथ अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अपमान रोक) अधिनियम, 1989 के तहत भी आरोप लगाए गए हैं। यह मामला केरल में कास्ट-आधारित भेदभाव और शैक्षणिक संस्थानों में छात्र सुरक्षा के मुद्दों को फिर से उजागर करता है।
भविष्य की दिशा
यह निर्णय न केवल प्रोफ़ेसरों को कड़ी जवाबदेही की ओर धकेलेगा, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों में छात्र कल्याण के लिए सख्त नियमों की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। कई कानूनी विशेषज्ञों ने कहा है कि इस तरह के मामलों में शीघ्र न्याय सुनिश्चित करने हेतु प्रक्रिया को तेज़ किया जाना चाहिए।