लश्कर-ए-ताइबा ने अपने तालिबानियों को जल-आधारित घुसपैठ, जूडो, कराटे, ताइक्वॉनडो और कुश्ती जैसी मार्शल आर्ट्स, साथ ही एआई‑सहायता वाले सिमुलेशन से प्रशिक्षित किया है। यह नया प्रशिक्षण मॉडल भारत की सीमा सुरक्षा को नई चुनौती प्रदान कर रहा है।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • लश्कर-ए-ताइबा ने जल-आधारित घुसपैठ और एआई‑सहायता वाले प्रशिक्षण को अपनाया।
  • मंगल जलाशय में आयोजित सत्रों में जूडो, कराटे, ताइक्वॉनडो और कुश्ती की कड़ी सीख दी जा रही है।
  • इन ‘अपग्रेडेड’ तकनीकों से भारत की सुरक्षा रणनीति को पुनः मूल्यांकन करने की आवश्यकता है।

पाकिस्तान के काश्मीर में स्थित मंगल डैम पर लश्कर-ए-ताइबा के प्रशिक्षण कैंपों की खबरें फिर से उभरी हैं। 2008 के मुंबई हमले के बाद इस जलाशय का नाम पहले ही कुख्यात हो चुका था, जब अज्मल कासाब और उनके सहयोगियों ने यहाँ से जल-आधारित घुसपैठ के अभ्यास किए थे। अब इस स्थान पर नई पीढ़ी के आतंकियों को जल-आधारित ऑपरेशन, उन्नत मार्शल आर्ट्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)‑आधारित सिमुलेशन के साथ प्रशिक्षित किया जा रहा है।

जल-आधारित घुसपैठ का पुनरुत्थान

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जल-आधारित मार्गों से भारत में प्रवेश करने की क्षमता पारंपरिक सीमा सुरक्षा को बायपास कर सकती है। लश्कर ने अब आधुनिक डाइविंग गियर, साइलेंट प्रोपेलर और जल-निगरानी से बचने के लिए एआई‑संचालित ड्रोन का प्रयोग शुरू कर दिया है। इस प्रकार, उनके पास न केवल जल-मार्गों का उपयोग करने की तकनीक है, बल्कि संभावित प्रतिरोध को पूर्वानुमानित करने वाले एल्गोरिदम भी हैं।

मार्शल आर्ट्स में गहन प्रशिक्षण

भयावह जल-ऑपरेशनों के साथ-साथ, समूह के युवा सदस्यों को जूडो, कराटे, ताइक्वॉनडो और कुश्ती जैसी मार्शल आर्ट्स में विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस प्रकार उनका शारीरिक फिटनेस, निकट दूरी के मुकाबले की क्षमता और मानसिक दृढ़ता बढ़ती है। कई वीडियो क्लिप्स में दिखाया गया है कि ये युवाओं को विभिन्न ग्रैप्लिंग तकनीकों और हथियार‑रहित मुकाबले की रणनीति सिखाई जा रही है, जो संभावित ग्राउंड कॉम्बैट में फायदेमंद हो सकती है।

एआई‑सहायता वाले सिमुलेशन का परिचय

लश्कर ने एआई‑आधारित सिमुलेशन टूल्स का उपयोग करके वास्तविक जीवन के परिदृश्यों को दोहराया है। इन सिमुलेशन में सीमा सुरक्षा की डिटेक्शन तकनीक, ड्रोन पावर, और सिविलियन एरिया में घुसपैठ की संभावनाओं को मॉडल किया जाता है। इसका अर्थ है कि आतंकियों को वास्तविक ऑपरेशन से पहले ही कई संभावित चुनौतियों का अभ्यास मिल जाता है, जिससे उनके सफलतापूर्ण प्रवेश की संभावना बढ़ जाती है।

भारत की प्रतिक्रिया और भविष्य की दिशा

इन नई ‘अपग्रेडेड’ तकनीकों के सामने भारत की सुरक्षा एजेंसियों को अपनी रणनीति को पुनः परिभाषित करने की जरूरत है। जल-आधारित घुसपैठ को रोकने के लिए जल-निगरानी सेंसर, एआई‑आधारित ड्रोन्स और काउंटर‑डाइविंग टीमों की तैनाती आवश्यक होगी। साथ ही, मार्शल आर्ट्स में प्रशिक्षित आतंकियों के खिलाफ निकट दूरी की रक्षा को सुदृढ़ करने हेतु विशेष एंटी‑ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार किए जा रहे हैं। अंततः, इस नई खतरे की परत को समझना और उसके विरुद्ध बहु‑स्तरीय सुरक्षा उपाय अपनाना ही भारत की सुरक्षा की गारंटी बन सकता है।