पोतुंडी दोहरी हत्या मामले में चेंथामारा को मौत की सजा दिलाने की दीर्घकालिक मांग अदालत ने की। अतिरिक्त जिला एवं सत्र कोर्ट‑IV, पालक्कड़ के जज केनेथ जॉर्ज 16 जुलाई को फैसला सुनाएंगे, जबकि डिस्ट्रीकट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी ने शमन रिपोर्ट भी प्रस्तुत की है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- चेंथामारा के खिलाफ मौत की सजा की मांग है।
- जज केनेथ जॉर्ज 16 जुलाई को फैसला सुनाएंगे।
- डिएलएसए ने शमन रिपोर्ट प्रस्तुत की, जो दंड निर्धारण में असर डाल सकती है।
पोतुंडी दोहरी हत्या के आरोपी चेंथामारा के लिए अतिरिक्त जिला एवं सत्र कोर्ट‑IV, पालक्कड़ ने 16 जुलाई को सजा सुनाने का समय निर्धारित किया है। इस सुनवाई में जज केनेथ जॉर्ज शमन रिपोर्ट पर विचार करेंगे, जिसे डिस्ट्रीकट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (DLSA) ने अभियोजन के बाद तैयार किया है। शमन रिपोर्ट का उद्देश्य आरोपी के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और पारिवारिक परिस्थितियों को समझकर दंड को उचित बनाना है, विशेषकर जब मौत की सजा पर चर्चा चल रही हो।
मौत की सजा की अभियोजन मांग
जून के मध्य में सार्वजनिक अभियोजक एम.जे. विजयाकुमार ने चेंथामारा को मौत की सजा की सख़्त मांग की। उन्होंने कहा कि हत्या पूर्व नियोजित थी और आरोपी समाज के लिए निरंतर खतरा बनता रहेगा। अभियोजन ने यह भी उजागर किया कि प्रमुख गवाह, पड़ोसी और पीड़ितों के रिश्तेदार अभी भी आरोपी से धमकी का सामना कर रहे हैं, जिससे सार्वजनिक सुरक्षा के लिहाज़ से मौत की सजा आवश्यक है।
रक्षा पक्ष का तर्क
रक्षा पक्ष के वकील जैकोब मैथ्यू ने कहा कि दोष सिद्ध केवल परोक्ष साक्ष्यों पर आधारित है, जबकि कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं है। उन्होंने जांचकर्ता की पूर्वाग्रहित दृष्टि को उजागर कर, बिहार व राजस्थान उच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए सुधार की संभावना को भी दर्शाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 27 जनवरी 2025 को पालक्कड़ के पोतुंडी में सुदकरन (50) और उनकी 75 वर्षीय माँ, लक्ष्मी की हत्याओं से जुड़ा है। जांच के अनुसार, चेंथामारा ने मान लिया था कि सुदकरन परिवार ने उसकी पत्नी व बेटी को खो दिया, और उन्होंने काली जादू का प्रयोग किया। अभियोजन ने 81 गवाहों की गवाही, 30 वैज्ञानिक साक्ष्य और कई मौखिक बयान पेश किए। चेंथामारा ने सभी आरोपों को खारिज किया।
भविष्य की संभावनाएँ
यदि जज मौत की सजा देते हैं, तो यह केरल में गंभीर अपराधों के लिए कड़ी सजा का एक मिसाल बन सकता है। वहीं, शमन रिपोर्ट के आधार पर दंड में परिवर्तन की संभावना भी बनी रहेगी, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में मानवीय पहलू को महत्व दिया जा रहा है।